Category Archives: दर्शन

आत्म-सुधार की कसरतें और चिट्ठाकारी

हमारी सोच-समझ और हमारे कर्म-व्यवहार के बीच कितनी एकरूपता है, इसी से निर्धारित होता है कि हमारा आत्म-विकास किस स्तर तक हो पाया है। ज्ञान को कर्म में परिणत कर पाना अक्सर हमसे मुमकिन नहीं हो पाता। किसी का श्रेष्ठ विद्वान, … Continue reading

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अव्यक्त ब्रह्म

प्रत्येक जीव अव्यक्त ब्रह्म है। बाह्य एवं अंत:प्रकृति को वशीभूत करके अपने इस ब्रह्मभाव को व्यक्त करना ही जीवन का चरम लक्ष्य है। कर्म, उपासना, मन:संयम अथवा ज्ञान- इनमें से एक, एक से अधिक या सभी उपायों का सहारा लेकर … Continue reading

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मौन: सत्य का द्वार

परमात्मा हमेशा मौन है। यह उसका सहज स्वभाव है। उसने कभी अपना नाम नहीं बताया। उसने कभी यह तक नहीं कहा कि उसका कोई नाम नहीं है। उसके सारे नाम ज्ञानियों और भक्तों द्वारा दिए गए नाम हैं। उसने कभी … Continue reading

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समय योग

समय योग मानव आत्माओं के लिए पूर्णता पाने का एक नूतन मार्ग है। इस योग में समय की साधना परमात्मा की शाश्वत अभिव्यक्ति के रूप में की जाती है। जीवन ऊर्जा नैसर्गिक है जिसे प्रकृति ने हमें प्रदान किया है। … Continue reading

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प्रतियोगिता और पदानुक्रम

यह संसार पदानुक्रम व्यवस्था (hierarchy) पर आधारित है। संसार और अध्यात्म के बीच का विभाजक बिन्दु पदानुक्रम व्यवस्था ही है । जब तक आप पदानुक्रम व्यवस्था के अंतर्गत हैं तब तक आप संसार में हैं और जिस क्षण आप पदानुक्रम … Continue reading

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