आत्म-सुधार की कसरतें और चिट्ठाकारी

हमारी सोच-समझ और हमारे कर्म-व्यवहार के बीच कितनी एकरूपता है, इसी से निर्धारित होता है कि हमारा आत्म-विकास किस स्तर तक हो पाया है। ज्ञान को कर्म में परिणत कर पाना अक्सर हमसे मुमकिन नहीं हो पाता। किसी का श्रेष्ठ विद्वान, लेखक या वक्ता होना अलग बात है और उसका श्रेष्ठ इंसान होना बिल्कुल दूसरी बात। हम जैसे साधारण लोग भी कई बार बहुत अच्छी और बड़ी-बड़ी बातें कर लेते हैं, लेकिन जीवन में उन्हीं बातों पर अमल कर पाने में सफल नहीं हो पाते। महान व्यक्तियों और हमारे-जैसे आम मनुष्यों में यही फर्क़ है। एक इंसान के तौर पर महान वही बन पाते हैं जो दूसरों की नज़र में खुद को महान साबित करने की होड़ में नहीं लगे रहते, बल्कि अहर्निश आत्म-सुधार की साधना में रत रहते हैं। क्योंकि, आत्म-सुधार ही संसार की सबसे बड़ी सेवा है। जो खुद अपना भला नहीं कर सकता, वह संसार का कैसे भला करेगा!

खासकर, लेखन और वाचन के पेशों से जुड़े लोगों के साथ तो कथनी-करनी की एकरूपता वाली नैतिकता को निभा पाना सबसे कठिन होता है। जो साहित्यकार अपने साहित्य में महान नज़र आता है, कई बार अपनी निजी जिंदगी में नैतिकता के मानदंडों पर सामान्य व्यक्ति से भी गया-गुजरा साबित होता है। जो पत्रकार अपनी पत्रकारिता में व्यवस्था-विरोधी नज़र आता है, कई बार अपने कॅरियर में प्रगति और जीवन की सुविधाओं के लिए उतना ही चापलूस और समझौतापरस्त भी होता है। कोई प्रवचनकर्ता मंच से जितने सुन्दर और प्रेरक सदुपदेश देता है, अपने व्यक्तिगत जीवन में अक्सर उसके ठीक विपरीत आचरण करता हुआ पाया जाता है। इसी तरह, कई अध्यापक भी अपने छात्रों से जिन नैतिक आदर्शों की बात करते हैं, अपने व्यक्तिगत जीवन में उनके ठीक विपरीत आचरण करते हैं। चिट्ठाकारी करते समय भी हम अक्सर ऐसी बातें कर जाया करते हैं, जिनकी कसौटी पर शायद हम खुद खरे नहीं उतरते। दूसरों की कमियों की आलोचना करना, दूसरों की नैतिकता का रखवाला बनना और दूसरों को उपदेश देना जितना सहज है, उतना ही कठिन है खुद अपने गिरेबान में झाँकना और अपनी कमियों को दूर करने की कोशिश करना।

गांधीजी के जीवन और कार्य-व्यवहार में हम पाते हैं कि अपनी कथनी और करनी में एकरूपता बनाए रखने के मामले में वह बहुत सजग रहते थे। जो भी बात उन्हें अच्छी लगती थी, उस पर तत्क्षण अमल करने की चेष्टा में वह जुट जाया करते थे और अपनी उस चेष्टा में सफल रहने के बाद ही दूसरों से उस पर अमल करने के लिए कहते थे। व्यावहारिक अर्थों में मन, वचन और कर्म की एकरूपता ही सत्य की साधना है। जब हम किसी व्यक्ति के चरित्र की बात करते हैं तो सबसे पहले यही देखते हैं कि उसकी सोच, कथनी और करनी में किस हद तक एकरूपता है। इस तरह की एकरूपता नहीं होने की वजह से ही आम जनता की नज़र में आज के अधिकतर राजनेताओं की कीमत गिर चुकी है।

आत्म-सुधार की चेष्टा का दूसरा कदम है अपनी दिनचर्या को व्यवस्थित करना। गांधीजी की दिनचर्या इस मायने में मुझे काफी आकर्षित करती रही है। इतनी व्यवस्थित दिनचर्या विरले किसी इन्सान की होती है। हर काम समय पर करना, जीवन के हर पल का भरपूर सदुपयोग करना, हर क्षण के महत्व को समझते हुए उसे पूरी तरह से जीना। उनकी दिनचर्या कुछ ऐसी प्रतीत होती है मानो वह समय की सतत बहती धारा में अतीत और भविष्य के किनारों से टकराए बगैर वर्तमान की मँझधार में सीधे बहे जा रहे हों। कहते हैं कि सुबह की सैर पर निकलने का उनका वक्त इतना निश्चित था कि उनको देखकर घड़ी मिलाई जा सकती थी। टॉलस्टॉय की प्रेरक कहानी “तीन प्रश्न” के संदेश को उन्होंने अपने जीवन में पूरी तरह से चरितार्थ कर लिया था। हर किसी से वह ऐसे मिलते थे मानो उनसे बात करने वाला व्यक्ति दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति हो। उनसे मिलने वाले हर व्यक्ति को यह महसूस होता था कि उस मुलाकात में उसने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण क्षणों को जी लिया है। हर काम को वह ऐसे करते थे मानो वह जिंदगी का सबसे महत्वपूर्ण काम हो। चाहे अपनी बकरी के लिए घास जुटाने का काम हो या आजादी के आंदोलन के संबंध में गंभीर विचार-विमर्श करना हो या ब्रिटिश वायसराय से मुलाकात के लिए जाना हो या किसी कुष्ठ रोगी की सेवा करनी हो, हर काम को वह उतना ही महत्वपूर्ण मानते थे। सच्चे मायने में गांधीजी ही कह सकते थे– मेरा जीवन ही मेरा संदेश है।

मेरे गुरुदेव की दिनचर्या भी कुछ ऐसी ही थी। हर सुबह एक नया जन्म और हर रात एक नई मौत। वह हमें सिखाते थे, जब सबेरे जगो तो पिछले दिन की कोई चिंता, कोई ग़म, कोई मलाल तुम पर हावी न हो। जब रात को सोने जाओ तो अगले दिन के लिए कोई परवाह, कोई परेशानी अपने दिमाग में समेट कर मत रखो। हर दिन को ऐसे गुजारो जैसे कि वही तुम्हारे जीवन का आखिरी दिन हो। एक-एक पल को जीओ और उसका पूरा-पूरा उपयोग करो। उन्होंने अपना पूरा जीवन पूर्वनियोजित ढंग से गुजारा। यहां तक कि अपनी मौत का मुहूर्त भी वर्षों पूर्व उन्होंने खुद ही मुकर्रर कर लिया था।

हालांकि महान लोगों में कई ऐसे भी हुए हैं जिन्होंने इस तरह की मशीनी दिनचर्या को अपनाने के बजाय समय के दबाव से मुक्त रहकर जीना पसंद किया। ऐसे व्यक्ति जीवन में सहजता, स्वच्छंदता और नैसर्गिकता को अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं। । वे अपनी मर्जी के मालिक होते हैं और मूड के हिसाब से काम करते हैं। वे समय की धारा के साथ सहज भाव से बहते हैं, उसकी तरंगों के साथ डूबते-उतराते हैं, अपनी तरफ से कोई चेष्टा नहीं करते।

मैं इस बहस में नहीं पड़ना चाहता कि दोनों में से किस तरह की दिनचर्या अधिक उपयुक्त है। दोनों ही रास्तों पर चलकर लोगों ने जीवन को सफल और सार्थक बनाया है। दोनों ही तरह की जीवन शैली वाले लोग महानता के शिखर तक पहुंचे हैं। एक ही समय के दो महान लोगों की दिनचर्या और जीवन शैली में भी हम यह बुनियादी अंतर देख सकते हैं। जैसे कि महात्मा गांधी और रवीन्द्रनाथ ठाकुर, चाणक्य और दाण्डयायन, श्रीराम शर्मा आचार्य और ओशो ….. ।

दिक्कत तब होती है जब हमारी दिनचर्या में जाने-अनजाने इन दोनों ही तरह की जीवन शैली एक साथ शामिल हो जाती है। ऐसा खासकर तब होता है जब हमारी बंधी-बंधाई दिनचर्या में कोई नया शगल शामिल हो जाता है और वह जीवन शैली में एक किस्म का व्यतिक्रम ला देता है। मेरी दिनचर्या में भी इसी कारण ऐसे व्यतिक्रम समय-समय पर आते रहे हैं। हालांकि, मैं समय योग का साधक बनने के लिए प्रयासरत रहा हूं, लेकिन जब भी मेरे ऊपर कोई नया शगल सवार होता है, दिनचर्या कुछ गड़बड़ा जाती है। जैसे कि, जब से चिट्ठाकारी का शगल हुआ, तब से मेरी दिनचर्या में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव आ गया। चिट्ठों को पढ़ने में अब काफी समय निकल जाता है। पहले यह समय लाइब्रेरी में गुजरता था, पत्र-पत्रिकाएँ और किताबों को पढ़ने में। सुबह-शाम ध्यान और व्यायाम में गुजरने वाले समय में भी चिट्ठाकारी ने सेंध मार ली। इससे मेरी सेहत पर भी काफी असर पड़ा। पहले लगभग हर सप्ताह अख़बारों में मेरे लेख छप जाते थे, लेकिन चिट्ठाकारी में सक्रिय होने के बाद से यह सिलसिला भी थम-सा गया।

हालांकि मैं चिट्ठाकारी में बहुत अधिक सक्रिय कभी नहीं रहा। पहले भी हर सप्ताह एक पोस्ट की औसत से ही लिखता था। लेकिन दूसरे चिट्ठाकारों की पोस्ट को पढ़ने, उन पर टिप्पणियाँ करने और चिट्ठा जगत की हलचलों पर नज़र रखने में काफी समय लग जाया करता था। लेकिन जब मुझे महसूस हुआ कि इस शगल ने मेरी दिनचर्या को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करना शुरू कर दिया है, तो मैं सावधान हो गया। हालांकि चिट्ठाकारी ने मेरे ऑफिसियल कामकाज को कभी प्रभावित नहीं किया, लेकिन नए-नए शुरू हुए वैवाहिक जीवन के कुछ हसीन लम्हों की चोरी इसने अवश्य की, जो बाद में कभी लौटकर नहीं आ सकेंगे। इसलिए, कुछ अरसे से मैंने चिट्ठाकारी से एक दूरी-सी बनाकर दिनचर्या को फिर से पटरी पर लाने की कवायद शुरू कर दी। कुछ चिट्ठाकार साथियों ने अपने मेल और कमेंट्स में मेरे इस ‘हायबरनेशन’ की चर्चा भी की।

अपने कई चिट्ठाकार साथियों को जब मैं उम्दा स्तर की चिट्ठाकारी में निरंतर सक्रिय देखता हूं तो जिज्ञासा होती है कि वे अपनी दिनचर्या में चिट्ठाकारी के शगल को किस तरह से एडजस्ट करते हैं। खासकर, रवि रतलामी जी, अनूप शुक्ला जी, सुनील दीपक जी, देबू दा, जीतू भाई, शास्त्री जी, ज्ञानदत्त जी, आलोक पुराणिक जी, अनामदास जी, प्रमोद सिंह जी, अभय तिवारी जी, अविनाश जी, मसिजीवी जी, श्रीश जी आदि जैसे चिट्ठाकार साथियों से मैं जानना और सीखना चाहता हूं कि वे अपनी दिनचर्या की तमाम महत्वपूर्ण व्यस्तताओं के साथ चिट्ठाकारी के शगल को कैसे इतनी शिद्दत के साथ पूरा कर पाते हैं!

7 comments

  1. “मैं इस बहस में नहीं पड़ना चाहता कि दोनों में से किस तरह की दिनचर्या अधिक उपयुक्त है। दोनों ही रास्तों पर चलकर लोगों ने जीवन को सफल और सार्थक बनाया है। दोनों ही तरह की जीवन शैली वाले लोग महानता के शिखर तक पहुंचे हैं। एक ही समय के दो महान लोगों की दिनचर्या और जीवन शैली में भी हम यह बुनियादी अंतर देख सकते हैं। जैसे कि महात्मा गांधी और रवीन्द्रनाथ ठाकुर, चाणक्य और दाण्डयायन, श्रीराम शर्मा आचार्य और ओशो ….. ।”

    जी बात बिल्कुल सही है… अपनी शैली वो होनी चाहिये जिसमे हम सहज हो सके और जिससे हमे किसी परेशानी का सामना ना करना पड़े।
    महात्मा गांधी और रवीन्द्रनाथ ठाकुर जैसे व्यक्तित्व ने किसी की जीवनशैली को ग्रहण करने की कोशिश नही की, बल्कि उन्होने उस शैली को आत्मसात किया… यही प्रवृत्ति हम सबमे होनी चाहिये।
    🙂

  2. अच्छा लिखा है। आओ कभी कानपुर रहो एकाध दिन साथ में तब सब बता-दिखा देते हैं कि कैसे ये लफ़ड़े निभते हैं। वैसे उसके पहले शायद लिखना भी हो जाये।

  3. मुख्यतः समय चुराया करता हूँ मैं 🙂

    जैसे कि अभी सब लोग बाहर जाने के लिए तैयार हो रहे हैं तो इस बीच मैं कुछ चिट्ठे पढ़ रहा हूँ और टिपिया रहा हूँ 🙂

    सुंदर आलेख 🙂

  4. वह व्यक्ति, जिसपर अपने से इतर लिखने-करने का दबाव नहीं है, उसके लिये यह ड्य़ूअल जीवन कम से कम होगा। ब्लॉगर जिसे मात्र मनमौजी ब्लॉगर ही रहना हो, उसे तो कोई मुश्किल नहीं। समस्या उनके साथ है जो अपना चमकता चेहरा दिखाना चाहते हैं, झुर्रियां छिपा कर!

    विशुद्ध ब्लॉगर को कोई परेशानी नहीं होनी चाहिये।

  5. वैसे आपके गुरुजी की एक बात खटक रही है…

    1 जब सबेरे जगो तो पिछले दिन की कोई चिंता, कोई ग़म, कोई मलाल तुम पर हावी न हो। जब रात को सोने जाओ तो अगले दिन के लिए कोई परवाह, कोई परेशानी अपने दिमाग में समेट कर मत रखो। हर दिन को ऐसे गुजारो जैसे कि वही तुम्हारे जीवन का आखिरी दिन हो। एक-एक पल को जीओ और उसका पूरा-पूरा उपयोग करो।

    2 उन्होंने अपना पूरा जीवन पूर्वनियोजित ढंग से गुजारा। यहां तक कि अपनी मौत का मुहूर्त भी वर्षों पूर्व उन्होंने खुद ही मुकर्रर कर लिया था।

    प्‍वाइंट एक और प्‍वाइंट दो एक दूसरे के व्‍याघाती हैं… 🙂
    ये

    • @ सिद्धार्थ जोशी,

      मेरे गुरुदेव ने अपने देह त्याग के समय का पूर्व-निर्धारण गुरू-सत्ताओं और प्रकृति की शक्तियों के साथ तालमेल करके किया था, पर यह बात हर कोई समझ नहीं सकता। इस बात का संबंध उनके उपदेश से जोड़ा जाना अनावश्यक है, वह जीवन जीने की कला सीखाने के क्रम में ऐसा कह रहे थे। उनकी बात पर अमल किया जाना महत्वपूर्ण है, न कि उनके जीवन के बारे में बगैर उनको ठीक से जाने बगैर प्रतिक्रियात्मक रूप से सोचना।

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