एक थी फूलन

फूलननियति जिंदगी में कैसे-कैसे रंग बिखर सकती है, इसे कोई नहीं जानता। फूलन भी नहीं जानती थी। पर नियति ने फूलन की जिंदगी के लिए बहुत-से रंग सजाए थे। जन्म से लेकर मरण तक फूलन का पूरा जीवन सुर्ख, चटक और स्याह रंगों से भरा था। ये रंग दु:, यातना, अपमान, विद्रोह, प्रतिशोध और कुख्याति से लेकर सम्मान, सुविधा, सत्ता और ग्लैमर तक के थे। इन सभी रंगों को फूलन ने अपने जीवन में देखा और भोगा था। उनकी आधी जिंदगी गोलियों और गालियों की अनगिनत बौछारों से पटी थी और बाकी आधी जिंदगी मीडिया और सिनेमा के कैमरों की क्लिक से। उनकी जिंदगी की असलियत किसी भी बेहतरीन कहानी से ज्यादा कहानीपन के तत्वों से युक्त थी। उनकी जिंदगी पर आधारित किताब और फिल्म ने दुनिया भर के समाजशास्त्रियों, बुद्धिजीवियों और नारीवादियों को उस सच से रू-ब-रू कराया, जिसे वे पोथी पढ़-पढ़ कर और सेमिनारों में बहस-मुबाहिसें करके ठीक से समझ नहीं पा रहे थे। फूलन की जिंदगी शुरू से आखिर तक सबक हैसमाज के ठेकेदारों, बुद्धिजीवियों, दलितवादियों और नारीवादियों के लिए। वह समकालीन भारतीय समाज में दलित चेतना और नारी चेतना की ज्वालामुखी के प्रस्फुटन का संकेत हैं। संसद में अपनी उपस्थिति से वह सामाजिक न्याय और नारी सम्मान की चेतना का प्रतिनिधित्व करती थीं।

भारत में बाल विवाह का शिकार तो लाखों मासूम लड़कियाँ अब भी होती हैं, सामंती सनक और आपराधिक प्रवृत्ति के कारण बलात्कार और सामूहिक बलात्कार का कहर हजारों अबलाओं पर अब भी टूटता है, लेकिन फूलन उनमें से कोई नहीं बनती। वह जीवट, जूझने का वह माद्दा सबमें नहीं होता, विद्रोह की वह धधकती आग सबमें नहीं पाई जाती, जो फूलन में थी। फूलन को नियति ने अपने क्रूर हाथों से गढ़ा था, यातना ने उसे मजबूत किया था, दु:ख ने उसे माँजा था, क्योंकि दु:ख केवल उन्हीं को माँजता है जो उसके मूल कारण को दूर करने की कोशिश करते हैं। पुण्य केवल उसी का प्रबल होता है जो अपने आँसुओं से धुलता है। यातना केवल उसी को मजबूत करती है जो अन्याय को सहकर चुप नहीं रह जाता, बल्कि उसका माकूल प्रतिकार करता है। फूलन को फूलन बनाया दु:ख, यातना और आँसुओं से लड़ने की उसकी अदम्य क्षमता ने और जब वह फूलन बन गईं तो फिर मीडिया की नजर में, जीवनीकारों की नजर में, फिल्म निर्माताओं की नजर में, राजनेताओं की नजर में अचानक बहुत महत्वपूर्ण बन गईं। सबने उन्हें हाथों-हाथ लिया, सबने उनके बाजार-मूल्य को समझा। उनसे चुनाव लड़वाए गए, उन पर किताब लिखी गई, उन पर फिल्म बनाई गई, उनको विदेश घुमाया गया। वह मीडिया की भाषा नहीं जानती थी, वह राजनीति की भाषा नहीं जानती थी, वह बाजार की भाषा नहीं जानती थी। उनकी जिंदगी की दास्तान बेचकर लाखों कमाए गए। उनके प्रति लोगों में कौतूहल के भाव को बेचकर सामाजिक न्याय की राजनीति का झंडा बुलंद किया गया। वह पढ़ी-लिखी नहीं थीं। यदि होतीं तो पता नहीं क्या-क्या कर गुजरतीं। पर उनमें सहज बुद्धि पर्याप्त थी। उन्होंने इन कारोबारियों के नेक इरादे को समझ लिया था। सुना है कि उन्होंने इन कारोबारियों से अपना हिस्सा भी मांगा और लिया था। ठीक ही किया था।

उनकी जिंदगी से जितना नफा उठाया जा सकता था, वह लोगों ने उठाया। फिर एक सामंती सोच और सनक वाले व्यक्ति ने उनकी जीवन-लीला समाप्त कर दी। फूलन को मौत तो खैर वैसी ही मिली जैसी वह चाहती थीं। कनपटी पर नजदीक से बस एक गोली, और खेल खत्म। पोस्टमार्टम से यह बात सामने आ गई थी कि उनकी मौत तो पहली ही गोली से हो चुकी थी, शेष पाँच गोलियाँ तो बेजान शरीर में ही ठूँसी गई थीं। इस हत्या ने उनका बाजार-मूल्य फिर से बढ़ा दिया। उनकी मौत एक महत्वपूर्ण मौत बन गई। उनकी लाश पर राजनीति का जोर का तांडव भी चला। संसद में कई दिनों तक हंगामा मचता रहा।

कारोबारियों के लिए फूलन शुरू से आखिर तक लाभ का सौदा थीं। निश्चित रूप से उन पर किताबें और लेख आगे भी लिखे जाएंगे, फिल्में आगे भी बनाई जाएंगी, क्योंकि उनकी दास्तान तो अब जाकर मुकम्मल हुई। (उनका हत्यारा नाटकीय ढंग से सर्वाधिक सुरक्षित तिहाड़ जेल से फरार हो गया और अंतत: नाटकीय ढंग से फिर पकड़ा भी गया।) वह अब और बिकेंगी। फूलन बनने से शोहरत मिलती है, फूलन बनने से राजनीति में जगह मिलती है, फूलन बनने से पैसा मिलता है, फूलन बनने से हजार गुनाह माफ हो जाते हैं। इन फायदों को जानकर चंबल की घाटी में फूलन के बाद बहुत-सी दस्यु सुंदरियाँ उतरीं। पर किसी को फूलन बन पाना नसीब नहीं हुआ, क्योंकि किसी के पास यातना भरी वह दास्तान नहीं थी, आत्म-सम्मान का वह गुरूर नहीं था, विद्रोह की वह चिन्गारी नहीं थी। नारीवादियों ने फूलन के महत्व को नहीं समझा, फूलन ने भी नारीवादियों को नहीं समझा। नारीवादी चाहते तो फूलन को अपनी महानायिका बना सकते थे, फूलन चाहती तो नारीवादियों की मसीहा बन सकती थीं। लेकिन वह चालाक नहीं थी, सीधी-सादी औरत थीं। उन्हें कारोबार करना, सौदेबाजी करना नहीं आता था।

फूलन शुरू से आखिर तक सामंतवाद का शिकार रहीं। सामंती सोच वाले ठाकुरों ने उन पर बचपन में अवर्णनीय जुल्म ढाए और वैसे ही सोच वाले लोगों ने उनकी इहलीला समाप्त कर दी। लेकिन सामंतवाद को जो सबक फूलन ने सिखाया, वह उनसे पहले किसी ने नहीं सिखाया था। उन्होंने सामंतवादियों को उन्हीं की भाषा में सबक सिखाया, क्योंकि सामंतवादी किसी और भाषा में नहीं सीख सकते। हाँ, यह सही है कि सामंतवादियों को सबक सिखाने के लिए फूलन की एक जिंदगी पर्याप्त नहीं है। सामंतवाद का जो वट-वृक्ष हजारों साल से तनकर खड़ा रहा है, उसे झुकाने और काट डालने के लिए फूलन को अभी कई और जन्म लेने पड़ेंगे। फूलन दोबारा जन्म लेंगी, बार-बार जन्म लेंगी, तब तक जब तक कि सामंतवाद और नारी का अपमान करने वालों का खात्मा न हो जाए।  

(स्वर्गीया फूलन देवी को श्रद्धांजलि स्वरूप यह आलेख मैंने 25 जुलाई, 2001 को उनकी हत्या के बाद लिखा था, जो 4 अगस्त, 2001 को राष्ट्रीय सहारा, नई दिल्ली में प्रकाशित हुआ था।) 

6 comments

  1. आपके चिट्ठे को इन्टरनेट इक्सप्लोरर में देखने पर बड़ी विसंगतियाँ दीख रही हैं। एक तरफ मुख्य टेक्स्ट बहुत छोटा है, तो दूसरी तर्फ दाँयी ओर के ‘बार’ मे स्थित टेक्स्ट तथा टिप्पणियों का टेक्स्ट बहुत ब.दा दीख रहा है।

    बड़ा टेक्स्ट एक-दूसरे के उपर पसर रहा है।

  2. अनुनाद जी, ऐसा शायद पहले वाली थीम की संरचना के कारण हो रहा होगा। आपके एक्सप्लोरर में ‘व्यू’ की सेटिंग्स में टेक्स्ट साइज ‘लार्ज’ होगा, जबकि उस थीम में मीडियम साइज टेक्स्ट व्यू में चिट्ठा ठीक तरह से दिखता था। हालाँकि मैंने एक बार फिर से थीम बदल कर प्रदर्शन की समस्या से निजात पाने की कोशिश की है। लेकिन इस तरह की समस्या के स्थायी निदान के लिए मैंने अपना चिट्ठा अपने डोमेन स्पेस पर भी स्थानांतरित कर लिया है, जहाँ थीम चयन की व्यापक स्वतंत्रता है। आप मेरे चिट्ठे को अब http://srijanshilpi.com पर भी देख सकते हैं।

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