ऑनलाइन हिन्दी और चिट्ठाकारिता

ऑनलाइन जगत में हिन्दी 

हिन्दी दुनिया की तीसरी सर्वाधिक बोली-समझी जाने वाली भाषा है। विश्व में लगभग 80 करोड़ लोग हिन्दी समझते हैं, 50 करोड़ लोग हिन्दी बोलते हैं और लगभग 35 करोड़ लोग हिन्दी लिख सकते हैं। लेकिन इंटरनेट पर हिन्दी काफी पिछड़ी अवस्था में है। ग्लोबल रीच द्वारा सितम्बर, 2004 में जारी भाषा पर आधारित विश्व की ऑनलाइन आबादी के आँकड़ों में शामिल 34 भाषाओं की सूची में हिन्दी को स्थान भी नहीं दिया गया था। वर्ष 2005 में भी ऑनलाइन जगत की 10 सबसे लोकप्रिय भाषाओं में हिन्दी को स्थान नहीं मिल सका। तेजी से विकसित हो रही गैर-अंग्रेजी ऑनलाइन भाषाओं में चीनी, जापानी, स्पेनिश, जर्मन, कोरियन, फ्रेंच, इटालियन, डच और पुर्तगाली प्रमुख हैं, जबकि हिन्दी अन्य गैर-अंग्रेजी ऑनलाइन भाषाओं में शामिल है। ऑनलाइन जगत में हिन्दी के पिछड़ने का प्रमुख कारण यह है कि इंटरनेट से जुड़े भारतीय अपने ऑनलाइन कामकाज में अंग्रेजी का प्रयोग करते रहे हैं। हालाँकि भारत में इंटरनेट से जुड़े लोगों की संख्या में तेजी से वृद्धि हो रही है और इंटरनेट विश्व सांख्यिकी के ताजा आँकड़े बताते हैं कि भारत में जून, 2006 तक 5 करोड़ 60 लाख इंटरनेट प्रयोक्ता हो चुके हैं और भारत अब अमरीका, चीन और जापान के बाद इंटरनेट से जुड़ी आबादी के मामले में चौथा स्थान हासिल कर चुका है।  ब्रॉडबैंड इंटरनेट कनेक्शनों की संख्या भारत में 15 लाख हो चुकी है। भारत में अब हर दो कंप्यूटर प्रयोक्ताओं में से एक इंटरनेट से जुड़ चुका है। इंटरनेट का प्रयोग बढ़ने के साथ-साथ ऑनलाइन हिन्दी की स्थिति भी बेहतर हो रही है। इंटरनेट पर हिन्दी के जालस्थलों और चिट्ठों की संख्या तेजी से बढ़ रही है और जक्स्ट कंसल्ट द्वारा जुलाई, 2006 में जारी ऑनलाइन इंडिया के आँकड़ों से पता चलता है कि ऑनलाइन भारतीयों में से 60% अंग्रेजी पाठकों की तुलना में 42% पाठक गैर-अंग्रेजी भारतीय भाषाओं में और 17% पाठक हिन्दी में पढ़ना पसंद करते हैं। हालाँकि पाठकों का यह रुझान ज्यादातर जागरण, बी.बी.सी. हिन्दी और वेबदुनिया जैसे लोकप्रिय हिन्दी वेबसाइटों की तरफ ही है, जिन्हें रोजाना लाखों हिट्स मिलते हैं।  

हिन्दी चिट्ठाकारी की स्थिति 

चिट्ठाकारी (ब्लॉगिंग) भारत में तेजी से लोकप्रिय हो रहा है और 85% भारतीय नेटिजन नियमित रूप से ब्लॉग पढ़ते हैं। किंतु हिन्दी चिट्ठों का संसार अभी उतना व्यापक नहीं हो पाया है। चिट्ठा विश्व के मुताबिक भारतीय चिट्ठों में अब तक केवल 7% ही हिन्दी में हैं। हिन्दी चिट्ठों की संख्या फिलहाल लगभग 400 है जिनमें से नारद के माध्यम से 326 चिट्ठों की ख़बर मिलती रहती है। लोकप्रिय माने जाने वाले हिन्दी चिट्ठों पर प्रकाशित किसी नई प्रविष्टि को औसतन सौ हिट्स मिलते हैं और उनको मिलने वाली प्रतिक्रियाओं की संख्या शायद ही कभी 30 से ऊपर जा पाती है। हिन्दी चिट्ठों के ज्यादातर पाठक अभी तक वे चिट्ठाकार हैं जो नारद और चिट्ठा विश्व जैसे हिन्दी चिट्ठा संकलकों के माध्यम से अन्य चिट्ठाकारों के विचारों से रूबरू होते रहते हैं। सर्च इंजन अथवा अन्य माध्यमों से स्वतंत्र रूप से हिन्दी चिट्ठों तक पहुँचने वाले नये पाठकों की संख्या बहुत कम ही है। फिर भी, अच्छी बात यह है कि शुरुआती दौर में ही हिन्दी चिट्ठों का दायरा विश्व पटल के काफी बड़े हिस्से में फैल चुका है। हिन्दी के चिट्ठाकार मुख्य रूप से भारत के अलावा संयुक्त राज्य अमरीका, कनाडा, जर्मनी, इटली, फ्रांस, स्वीटरजरलैंड, आस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, रूस, सिंगापुर, कुवैत, संयुक्त राज्य अमीरात और फिलीपींस आदि देशों में सक्रिय हैं। भारत के ज्यादातर राज्यों में हिन्दी चिट्ठाकारों की मौजूदगी देखी जा सकती है जिसमें हिन्दी भाषी राज्यों के अलावा दक्षिण और पश्चिम भारत के राज्यों में उनकी सक्रियता विशेष रूप से उल्लेखनीय है।  विश्व में हिन्दी भाषियों की विशाल संख्या और इंटरनेट पर हिन्दी के निरंतर बढ़ रहे प्रयोग को देखते हुए हिन्दी चिट्ठाकारिता का भविष्य अत्यंत उज्ज्वल दिखता है, हालाँकि हिन्दी चिट्ठे अब तक ऑनलाइन हिन्दी पाठकों के बहुत बड़े वर्ग तक नहीं पहुँच पाए हैं। लेकिन हिन्दी चिट्ठाकारिता का सबल पक्ष है कलम के धनी और तकनीकी रूप से कुशल प्रतिभाशाली चिट्ठाकारों का इससे जुड़ा होना। लेकिन इससे भी अधिक महत्वपूर्ण है स्वदेश भारत और स्वभाषा हिन्दी के प्रति सबका अनन्य प्रेम, जो उन्हें एकसूत्र में बाँधता है और इंटरनेट पर हिन्दी को गौरवपूर्ण स्थान दिलाने के लिए निरंतर सचेष्ट रहने हेतु प्रेरित भी करता है। हिन्दी चिट्ठाकारों द्वारा शुरू किए गए अक्षरग्राम, नारद, सर्वज्ञ, निरंतर, परिचर्चा, शून्य, ब्लॉगनाद, बुनो कहानी और अनुगूँज जैसे उल्लेखनीय सहकारी प्रयासों से हिन्दी चिट्टाकारिता के भविष्य के प्रति आशा बलवती होती है। भारत और दुनिया के विभिन्न शहरों में हिन्दी चिट्ठाकारों के अक्सर होते रहने वाले सम्मेलन उनकी सजगता और सक्रियता को बढ़ाते हैं। 

व्यावसायिकता और सरोकार

हिन्दी चिट्ठाकारिता को व्यावसायिकता से जोड़े जाने और चिट्ठों पर विज्ञापन रखे जाने की बात करते समय हिन्दी चिट्ठों की प्रसार संख्या का सवाल बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। कारोबार और विज्ञापन जगत की दृष्टि में हिन्दी चिट्ठों ने अभी तक वह ताकत हासिल नहीं की है जिसके आधार पर मीडिया संस्थान और विज्ञापन कंपनियाँ हिन्दी चिट्ठों की ओर आकर्षित हो सकें। रवि रतलामी जैसे चर्चित हिन्दी चिट्ठाकार ने हिन्दी चिट्ठों को व्यावसायिकता से जोड़ने की दिशा में जो पहल की है वह महत्वपूर्ण है। व्यावसायिकता का एक प्रमुख तत्व है प्रतिस्पर्धा और बहुत-से लोग मानते हैं कि प्रतिस्पर्धा से गुणवत्ता (क्वालिटी) का विकास होता है और परिमाण (क्वांटिटी) में वृद्धि होती है। बहुत संभव है कि हिन्दी चिट्ठाकारिता में व्यावसायिकता और प्रतिस्पर्धा का तत्व जुड़ने के बाद उसकी गुणवत्ता में बेहतरी और परिमाण में बढ़ोतरी देखने को मिले। हालाँकि ई-स्वामी और मितुल जैसे कुछ चिट्ठाकार इससे भिन्न राय रखते हैं और हिन्दी चिट्ठाकारिता को ओपन सोर्स और विकिपीडिया की तरह की परियोजनाओं के माध्यम से आगे बढ़ाने का इरादा रखते हैं। जीतेन्द्र चौधरी और शशि सिंह जैसे हिन्दी चिट्ठाकार मीडिया कंपनियों को मांग के आधार पर कंटेंट प्रदान करने की सेवा शुरू करने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं। मैं भारत-2020 के राष्ट्रीय मिशन के साथ हिन्दी चिट्ठाकारिता को जोड़े जाने तथा चिट्ठाकारों द्वारा अपनी विशेषज्ञता के क्षेत्र में ऑनलाइन सेवाएँ शुरू किए जाने पर विशेष बल दे रहा हूँ। इसके साथ-साथ स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसे राष्ट्रीय सरोकारों तथा सूचना के अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एवं अन्य मौलिक अधिकारों तथा संविधान में उल्लिखित नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों के साथ हिन्दी चिट्ठाकारिता को जोड़े जाने की जरूरत है। हिन्दी के पहले ब्लॉगजीन निरंतर का प्रकाशन फिर से शुरू करके हिन्दी के कुछ मूर्धन्य चिट्ठाकारों ने इस दिशा में अत्यंत ठोस कदम बढ़ाया है। आवश्यकता है ऐसे सहकारी प्रयासों को निरंतर आगे बढ़ाते रहने की। जो चिट्ठाकार साथी इस दिशा में  सक्रिय भूमिका निभाना चाहते हैं, उनसे मेरा विनम्र अनुरोध है कि इस लेख पर अपनी प्रतिक्रिया और सुझाव देने के साथ-साथ अपनी विशेषज्ञता एवं अभिरुचि के क्षेत्र का उल्लेख करते हुए हिन्दी चिट्ठाकारिता के भावी नवीन प्रयासों में अपनी सहभागिता के लिए सहमति भी व्यक्त करने की कृपा करें।

16 comments

  1. चाहे वह मितुल जी का तरीका हो या जीतेन्द्र जी का याा फिर एकाकी लेखन यह सब इन्टरनेट पर हिन्दी को आगे ले जाते हैं। जरूरत है अलग अलग तरह के चिट्ठों को साथ लाने की जैसा अग्रेजी में है।

  2. सही कहा आपने ! हिन्दी में लिखने वालों को सर्च इंजन से मिलने वाली हिट्स नगण्य होती हैं । अपना अनुभव कहूँ तो मेरे रोमन हिन्दी वाले बलॉग पर कुल हिट्स का ६० प्रतिशत उन अनजान लोगों का होता है जो किसी तालाश में वहाँ पहुँचते हैं ।

  3. सृजन शिल्पी जी,
    आपने जाल पर हिन्दी की स्थिति का वर्तमान और भविष्य का लेखा जोखा बहुत ही सम्यक तरीके से किया है। इस तरह का मंथन लगातार होते रहने से अंतर्जाल पर हिन्दी के तीव्र विकास के लिये मार्गदर्शन होता रहेगा।

  4. तरुण बंसल के लिये:
    ————–

    भाई तरुण,

    यूनिकोड के पदार्पण के बाद आजकल फांट डाउनलोड करने की झंझट खत्म हो गयी है। आप तुरन्त कम्प्यूटर पर हिन्दी में लिखना शुरू कर सकते हैं। कोई ज्यादा ताम-झाम की जरूरत नही है।

    ज्यादा जानकरी के लिये यहां देखें:
    http://akshargram.com/sarvagya/index.php/How_to_Type_in_Hindi

    http://akshargram.com/sarvagya/index.php/Can_not_See_Hindi

    http://saptrang.wordpress.com/2006/08/09/how_to_read_write_hindi_on_computer/

    http://pratibhaas.blogspot.com/2006/07/hindi-computing-tools-and-techniques.html

  5. तरुण भाई की समस्या का हल अनुनाद जी ने बता दिया है।

    रत्ना बहन को मेरा सुझाव यह है कि अपने इंटरनेट एक्सप्लोरर में view में जाकर text size को मनचाहे आकार में बड़ा कर लें, जिससे फोण्ट बड़े दिखने लगेंगे और लेख अधिक स्पष्ट पढ़ा जा सकेगा। वर्डप्रेस पर फोण्ट का साइज बड़ा करने की सुविधा नहीं है। थीम बदलनी पड़ेगी।

  6. शोएब भाई, फिलहाल तो मजबूरी है, वर्डप्रेस.कॉम फॉण्ट का साइज बढ़ाने की सुविधा नहीं देता। थीम बदलने की बात सोची जा सकती है, क्योंकि इस थीम पर कुछ ज्यादा ही छोटा दिखता है फोण्ट, परंतु मुझे यह थीम पसंद है। देखता हूँ, शायद कोई हल निकल आए जल्द ही।

  7. हिन्दी के सम्बन्ध में मुझे ललक तो बहुत थी और कुछ विदेशी लेखकों के लेखों का हिन्दी में अनुवाद करने के कारण यूनीकोड पद्धति से भी परिचित था परन्तु हिन्दी में ब्लाग बनाने और उसे लिखने की प्रेरणा मुझे मेरे मुम्बई ब्लाग के मित्र शशि ने दी. इस माह के आरम्भ में उनकी प्रेरणा ने मुझे नई राह दिखाई. उसके बाद तो अब आनन्द की सीमा ही नहीं है. हिन्दी के उभरते परिवार को देखकर अत्यन्त सुखद अनुभूति होती है.

  8. मै हमेशा पडते रहता हु मुझे यह वेबसाइट बहुत अच्छा लगता है,मुझे बहुत कुछ लिखना चाहता हु किन्तु समय के अभाव के कारण लिख नही पाता,
    अगर पडने वाले को पता है तो क्रृपया मेरे ई-मेल पर पता भेजे मै आपका हमेशा आभारी रहुगा,
    हैद्राबाद,

  9. इस माह के आरम्भ में उनकी प्रेरणा ने मुझे नई राह दिखाई. उसके बाद तो अब आनन्द की सीमा ही नहीं है. हिन्दी के उभरते परिवार को देखकर अत्यन्त सुखद अनुभूति होती है.

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s