मौन: सत्य का द्वार

परमात्मा हमेशा मौन है। यह उसका सहज स्वभाव है। उसने कभी अपना नाम नहीं बताया। उसने कभी यह तक नहीं कहा कि उसका कोई नाम नहीं है। उसके सारे नाम ज्ञानियों और भक्तों द्वारा दिए गए नाम हैं। उसने कभी अपने परमात्मा होने का भी दावा नहीं किया। उसे बोलने की, दावा करने की और अपना अस्तित्व सिद्ध करने की कभी जरूरत नहीं पड़ती। जिसे ऐसा करना पड़े वह परमात्मा नहीं है। दावा अहंकार का, अज्ञान का, अशक्ति का लक्षण है। परमात्मा आख़िर क्यों दावा करे? सत्य इतना विराट और इतना अनंत है कि उसे किसी भी तरह से अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता। अनंत को भला सीमा में कैसे बाँधा जा सकता है? सत्य के इतने आयाम हैं कि किसी भी तरह से एक साथ वे सभी आयाम अभिव्यक्त नहीं हो सकते। उसे अभिव्यक्त करने की कोशिश करते ही उसके बहुत से अंतर्विरोध सामने आ जाते हैं और वास्तविक सत्य तिरोहित हो जाता है। ब्रह्माजी ने केवल ‘द’ का उच्चारण किया था और देवताओं ने उसका मतलब लगाया दान, दानवों ने मतलब लगाया दया और मनुष्यों ने मतलब लगाया दमन। पता नहीं ब्रह्माजी का अपना आशय क्या रहा होगा! सत्य के बारे में कुछ भी बोलते ही तत्काल भ्रांति उत्पन्न हो जाती है। इसलिए जो बोला जा सके वह सत्य नहीं है। सत्य मौन में ही सत्य बना रहता है। मौन के बाहर की दुनिया में उसकी विकृत और भ्रांत छाया ही सामने आ पाती है। मौन के बाहर की दुनिया मन की दुनिया है जबकि मौन की दुनिया आत्मा की और रहस्य की दुनिया है। इसलिए जो जानते हैं वह बोलते नहीं और जब वे बोलते भी हैं तो विविध उपायों से केवल यह बताने के लिए बोलते हैं कि सत्य को बोला नहीं जा सकता या फिर जिज्ञासुओं के बहुत पूछने पर सत्य के बारे में वे कुछ इशारे भर करने की चेष्टा करते हैं।  

      स्वयं गहन मौन में उतरे बिना सत्य का, परमात्मा का साक्षात्कार संभव नहीं है। सत्य के सभी साधकों को अंतत: मौन में ही उतरना पड़ता है। बुद्ध ने पहले 12 वर्ष तक दूसरे सारे उपाय करके देख लिए थे, मगर नहीं मिल पाया सत्य उनको। अंत में वह मौन में उतरे और उन्हें सहज ही सत्य का ज्ञान उपलब्ध हो गया। ध्यान रहे, वास्तविक मौन सहज स्वाभाविक होता है, उसे चेष्टापूर्वक साधा नहीं जा सकता। मौन निर्विचार की स्थिति है। वह विचारों को सप्रयास रोकना नहीं है, बल्कि साक्षीभाव से उपजे विचारों की स्वाभाविक शून्यता है। सत्य का कोई शास्त्र नहीं है और न हो सकता है। शास्त्र बनते हैं सत्य के बारे में संवादों के आधार पर। लेकिन इस तरह के संवाद केवल कामचलाऊ इशारे भर होते हैं। ज्ञानीजन सत्य के बारे में कभी-कभी इशारे कर जाते हैं। लेकिन वे केवल इशारे भर हैं, वास्तविक सत्य नहीं। दरअसल सत्य को संवादों के जरिए कभी अभिव्यक्त किया ही नहीं जा सकता। इसलिए ज्ञानियों के बीच अक्सर संवाद संभव नहीं हो पाते। जैसे दो समान जलस्तर वाले स्रोतों के बीच जल का बहाव संभव नहीं है, जैसे दो समान मात्रा के आवेशित स्रोतों के बीच ऊर्जा का संचरण संभव नहीं है, उसी प्रकार दो ज्ञानियों के बीच भी सत्य का संवाद संभव नहीं है। संवाद के लिए यह जरूरी है कि एक ज्ञानी हो और दूसरा अज्ञानी। इसी तरह दो अज्ञानियों के बीच भी संवाद संभव नहीं है। उनके बीच केवल विवाद ही संभव है। ज्ञानीजन आपस में हमेशा मौन में ही संभाषण करते हैं, जबकि अज्ञानी हमेशा बोलकर, बल्कि जोर-शोर से बोलकर भाषण करते हैं। ज्ञानियों के बीच होने वाले संभाषण को विरले ही कभी कोई जान पाता है। इसलिए ऐसे संभाषणों से शास्त्र नहीं बन पाते। हमारे जितने भी शास्त्र हैं, धर्मग्रंथ हैं और आप्त वचन हैं, वे प्राय: ज्ञानियों और अज्ञानियों के बीच हुए संवादों के विवरण हैं जैसे, गीता कृष्ण (ज्ञानी) और अर्जुन (अज्ञानी) के बीच हुए संवाद का विवरण है। बुद्ध और महावीर के बीच कभी कोई संवाद नहीं हुआ, जबकि वे न केवल समकालीन थे, बल्कि उनके कार्यक्षेत्र भी एक ही थे। कबीर और फरीद भी समकालीन थे। कहते हैं कि शिष्यों के आग्रह पर वे एक-दूसरे से मिले भी और तीन दिनों तक एक साथ रहे भी। लेकिन उनके बीच सत्य की कोई परिचर्चा या ज्ञानवार्ता नहीं हुई। शास्त्रार्थ हमेशा मूर्ख और धूर्त लोग करते हैं। वे ऐसे मूर्ख होते हैं जो वास्तव में जानते कुछ भी नहीं लेकिन अपने को महापंडित समझते हैं। उनकी धूर्तता यह है कि लोगों के सामने वे अपने ज्ञान का आडंबर फैलाकर अपने लिए सुविधा, संपत्ति और सम्मान जुटाना चाहते हैं। शास्त्रार्थ के दौरान उनके बीच इस बात के लिए प्रतियोगिता होती है कि जो अपने को सबसे बड़ा ज्ञानी सिद्ध कर देगा वही सारी सुविधा और सम्मान का दावेदार होगा।  

अगर मुहम्मद और ईसा समकालीन होते और एक ही प्रदेश में रह रहे होते तो आमने-सामने रहकर भी उनके बीच सत्य पर कोई संभाषण या संवाद संभव नहीं हो पाता। मुहम्मद साहब ने ईसा को अपना पूर्ववर्ती फरिश्ता स्वीकार किया था और यह भी कहा था कि वह ईसा के कार्यों को आगे बढ़ा रहे हैं। लेकिन आज मुहम्मद के तथाकथित अनुयायी ईसा के तथाकथित अनुयायियों के साथ लड़ रहे हैं। उनके बीच के संघर्ष को हटिंगटन जैसे बुद्धिजीवियों द्वारा ‘सभ्यताओं के संघर्ष’ का नाम दिया जा रहा है। आज अमरीका सारे तथाकथित ईसाइयों की तरफ से लड़ने की घोषणा कर रहा है और उसका दुश्मन है ओसामा-बिन-लादेन, जो अपने को मुहम्मद के अनुयायियों का नेता मानता है। मुहम्मद के खुदा और ईसा के गॉड एक ही हैं, दोनों के स्वर्ग भी एक ही हैं। लेकिन मुसलमानों और ईसाइयों के बीच झगड़ा अलग-अलग शब्दों, अलग-अलग शास्त्रों, अलग-अलग भाषाओं और अलग-अलग प्रतीकों के कारण चल रहा है। लेकिन अगर दोनों एक साथ मौन में उतर जाएँ तो पाएंगे कि सत्य तो वास्तव में एक ही है, परमात्मा तो एक ही है। अगर हिंदू अपने ईश्वर को राम, कृष्ण, विष्णु या शिव कहने की बजाय गहरे मौन में उतर जाएं और मुसलमान भी अल्लाहो-अकबर कहने की बजाय मौन में उतरना शुरू कर दें तो फिर यह सारा झगड़ा खत्म। फिर सबके लिए एक ही मार्ग है, एक ही धर्म, एक ही ईश्वर है। फिर यह सारी सांप्रदायिक हिंसा, यह सारा धार्मिक विद्वेष अचानक तिरोहित हो जाएगा।  

जब कभी आपके मन में सत्य और परमात्मा के बारे में जिज्ञासा हो तो बस मौन हो जाएँ। बुद्ध से परमात्मा के बारे में कई बार प्रश्न किए गए, लेकिन हर बार बुद्ध मौन रह गए। वह मौन ही बुद्ध का उत्तर था। मौन के अलावा परमात्मा और सत्य के बारे में किए गए किसी भी प्रश्न का कोई उत्तर सर्वथा गलत और मूर्खतापूर्ण होता।  बुद्ध ने अपने उपदेशों में परमात्मा के बारे में कोई चर्चा नहीं की।

मौन में उतरने के लिए किसी मध्यस्थ की जरूरत नहीं पड़ती। सचाई यह है कि आप तब तक मौन में नहीं उतर सकते जब तक कि सारे मध्यस्थ आपके मन से विदा नहीं हो जाते। कोई गुरु, कोई मंत्र, कोई वेद आपको मौन में नहीं ले जा सकता, आपको स्वयं ही अकेले उतरना होगा। अगर आप गहरे मौन में उतर सकें तो धर्म के उन सभी ठेकेदारों की जरूरत खत्म हो जाएगी, जो भक्त और भगवान के बीच बिचौलिए बनकर बैठे हुए हैं। अगर आप स्वयं सत्य को जान लेंगे तो सारे पंडित-पुरोहितों, सारे मुल्ले-मौलवियों, सारे पोप-पादरियों की दुकानें बंद हो जाएंगी, उनका सारा धंधा चौपट हो जाएगा। इसलिए उन्होंने धर्म का सारा तानाबाना इस तरह बनाकर रखा हुआ है ताकि आप कभी मौन में नहीं उतर सकें। दुनिया के किसी भी पंडित, किसी भी मौलवी और किसी भी पादरी ने आज तक न तो परमात्मा को कभी जाना है और न ही कभी आगे जान पाएगा। क्योंकि पंडित, मौलवी और पादरी के पास केवल रटे-रटाए शब्द हैं और उनकी भ्रांत व्याख्याएँ हैं। वे सिर्फ तोते हैं या अगर आधुनिक उपमान दें तो टेपरिकार्डर हैं। कोई टेपरिकार्डर यदि अनंत काल तक भी ईश्वर का कोई नाम या मंत्र दोहराता रहे तो क्या उसे परमात्मा की प्राप्ति हो जाएगी? जिसे स्वयं ही परमात्मा की उपलब्धि नहीं हुई हो उसके द्वारा किसी की दान-दक्षिणा के बदले किए जाने वाले नाम-जप, अनुष्ठान, पूजा, कर्मकांड आदि से किस अभीष्ट की प्राप्ति हो सकेगी? उनका धंधा तभी तक चल सकता है जब तक आप अज्ञानी और दु:खी बने रहें। आपको पता है कि जब कभी कोई सच्चा साधक सत्य को जानने की चेष्टा शुरू करता है तो पंडितों के देवता तक उसके मार्ग में बाधाएँ खड़ी करते हैं। पुराणों की हजारों कथाओं में ऐसा उल्लेख आता है कि जब कोई तपस्वी तप और ध्यान में लीन होने लगता है तो इंद्र का सिंहासन डोलने लगता है। शम्बूक को एकांत वन में मौन ध्यान में लीन देखकर वशिष्ठ जैसे मुनि नाराज हो जाते हैं और मर्यादा पुरुषोत्तम राम के हाथों उनका वध करवा देते हैं। क्योंकि कोई शूद्र अगर सत्य को जान लेगा तो फिर ब्राह्मणों का क्या होगा, जिनका ब्रह्मज्ञान पर एकाधिकार है! 

परमात्मा से प्रार्थना करने के लिए शब्दों की या किसी भाषा की कोई जरूरत नहीं। अगर आप शब्दों के माध्यम से उस तक पहुंचने की कोशिश करेंगे तो चूक जाएंगे, क्योंकि कोई शब्द आपको वहाँ तक नहीं ले जा सकता। सत्य के मार्ग पर शब्द व्यर्थ हैं, वे आपके लिए भार और मार्ग की बाधा हैं। जिस क्षण आपका मन शब्दों के जंजाल से मुक्त होता है और आप नि:शब्द गहन मौन में उतरते हैं, परमात्मा का साम्राज्य आपके लिए खुल जाता है। ज्योंही आप मौन होते हैं, आप न तो हिन्दू रह जाते हैं और न ही मुसलमान और न ही ईसाई। उस स्थिति में आप न तो भारतीय रह जाते हैं, न ही पाकिस्तानी और न ही अमरीकी। आप एक शून्य द्वार में प्रवेश कर जाते हैं, जहाँ कोई विचार या मत या वाद नहीं है।  

सारे विचार अहंकार की वजह से पैदा होते हैं। अहंकार ही शैतान है और अहंशून्यता ही ईश्वरत्व है। जिस क्षण आपका अहं तिरोहित होता है, उसी क्षण सारे विचार भी शून्य में लीन हो जाते हैं। परम शून्य में आत्मा-परमात्मा के द्वैत भाव का भी बोध नहीं होता। यही स्थिति निर्वाण अथवा मोक्ष अथवा कैवल्य की है। इस स्थिति में मन का पूर्ण विलय हो जाता है और निर्विचार के लोक में हम स्थित हो जाते हैं। यही संतुलन और साम्य की स्थिति है जहाँ से कभी लौटना नहीं होता। वह चिरशांति का कालातीत लोक है। उस स्थिति में आप अस्तित्व के साथ इस प्रकार एकाकार हो जाते हैं जैसे नमक का कोई दाना सागर में एकाकार होकर स्वयं सागर बन जाता है। केवल साक्षीभाव रह जाता है और बाकी सबकुछ शून्य हो जाता है। वही परमानन्द की सहज स्थिति है। यही आपकी अंतिम नियति है, अंतिम मंजिल है, जिसे मुक्ति कहते हैं।

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9 Responses to मौन: सत्य का द्वार

  1. बहुत सारे विचार आपस में भिड़ गये। मौन वाणी को नकारता है, क्या यह कुदरत से विद्रोह नहीं?
    -प्रेमलता पांडे

  2. SHUAIB says:

    विचार पढे आपके

  3. मौन का वाणी से कोई विरोध नहीं है। अंतर केवल आपकी गति की दिशा का है। मुक्ति, सत्य और परमात्मा की ओर बढ़ने के लिए मौन ही मार्ग है। जबकि संसार, प्रपंच और प्रकृति की लीलाओं में शामिल होने के लिए शब्द ही साधन हैं।

    • SWAMI PREM says:

      SENSES v/s SILENCE
      Author: SWAMI PREM GOVIND
      SENSES GIVES IMAGE WORLD EXCEPT YOU.
      SILENCE GIVES YOU AND A REAL WORLD.
      SENSES FILL WITH OTHERS.
      SILENCE EMPTY WITH YOURS.
      SENSES COVERING YOU.
      SILENCE UNCOVERING YOU.
      WITH SENSES MEET WITH OTHERS.
      IN SILENCE MEET WITH SELF.
      SENSES LEFT ALWAYS EMPTY.
      SILENCE FILLED WITH OWN TRUTH.
      SENSES CAN NOT GO BEYOND SENSES.
      SILENCE GO BEYOND.
      SENSES HELPS TO SEE.
      SILENCE IS SEEING.
      SENSES FEELS RUN AND BITE.
      SILENCE FILLED WITH CALM AND QUIET.
      SENSES KEEP SLEEPING WITH EYE.
      SILENCE MAKE AWAKE AND TAKE YOU ON A REAL JOURNEY.

      ARE YOU READY TO TRAVEL WITH ME

    • BE DEATH BEFORE DEATH
      Author: SWAMI PREM GOVIND
      Updated
      IN A DAY .
      AT LEAST FOR 01 HOUR.
      BE DIED FOR SELF.

      SIT.

      CLOSE EYE.

      LOOK IN.

      YOU ARE DEAD.
      NO WHERE IN.
      NO WHERE OUT.

      EXAMINE SELF .
      SEE SELF.

      NOR AS A BODY NOR AS A SOUL.

      CHECK SELF AS A SECOND PERSON.
      DO NOT INTERFERE ANY WHERE.

      SEE YOUR COMING BREATH.
      SEE YOUR OUT BREATH.
      LOOK AT EACH AND EVERY PART OF YOUR BODY AT A DISTANCE.

  4. सृजन शिल्पी जी,
    बात तो आपने बिल्कुल सही कही है, क्योंकि मौन ही सत्य है, मौन ही भगवान है पर ध्यान रखें मौन ही शैतान भी है।

  5. डॉ.नूतन पोळ says:

    ek maun baahari hai aur dusara andaruni. jab hame shri. guru ki krupase aham ke bare me shabd dnyan ho jayega tatha unhone bataye hue marg par ham chal padenge tab man dhire dhire shant ho jayega tab ham andurni maun ka aanand le payenge. isliye ham bahari maun ka stom na badhaye aur jitani jaruri hai utani bat kare jisase vyavahar me koi asuvidha na ho.

    aur vyarth batome apna vakt na gujare aisa ham sochate hai. isi marg par dat kar upasana karate karate hame anubhav ke adhar par atmdnyan prapt ho jayega.
    sabse shri. guruke bataye hue marg par avirat chalane ki cheshta ho yahi Shri.guru charan dasi ki prarthana.

  6. Nishant Kaushik says:

    जे कृष्णमूर्ति ने कहा है,” सत्य मार्ग रहित भूमि है, वहां किसी भी माध्यम से पंहुंच पाना असंभव है,” और इसके पहले आदरणीय प्रेमलता जी ने कहा की बहुत सारे विचार भीड़ गए हैं, मैं यह कहना चाहूँगा कि आदरणीय जी ने जो मौन के ऊपर टिपण्णी दी है, वह कितनी सार्थक है, और बिना आलोचना करे हमें उसकी सार्थकता बतानी है, आशय ये है कि एक विचार का निर्माण तब ही हो सकता है, जब किसी पहले का दमन हो. कहीं कहीं वाणी मौन कि दुश्मन हो सकती है, क्यूंकि मौन का अर्थ मुंह मैं टेप बांधना नहीं है, यदि आप शांति की खोज मैं हैं, तो आप स्वयं ही सिद्ध करते हैं कि, यहाँ शांति अनुपस्थित है, और जहाँ शांति न हो वहां अशांति हो सकती है, इसी कारण अगर आप कहें या न कहें, “अ” का प्रयोग एक बार मैं “ब” को अनुपस्थित करने से ही हो पायेगा. वह सत्य जो कि आदि से है और अनंत तक जा रहा है, उसका वर्णन ये गुरु करेंगे क्या?, क्यूंकि वर्णन जानकारी है, और वर्णित न किया जाये वही ज्ञान है वही सत्य है, वही मौन, अतः मौन ही सत्य है..कुल मिलकर अगर सत्य को वाणी दी जाये तो वह शायद दुसरे अर्थ को उत्पन्न करके मूल सत्य को अनुपस्थित कर देगी..अतः ज्ञान सत्य और मौन तीनों कि दुश्मन कभी कभी वाणी होती है, आप भी तो कहते हैं, कि भगवान राम का जन्म फलां समय हुआ था,”था” से आशय भूतकाल है, “था”याने अब नहीं हैं राम”राम का जान हुआ “है” अर्थात राम पहले नहीं थे,यह तो अस्तित्व होगया जो आज है कल नहीं, और जो आज कल है वह अस्तित्व है, सत्य और इश्वर अस्तित्व नहीं है, कालातीत हैं..

    kaushiknishant2@gmail.com

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