Srijan Shilpi

कब तक चलेगा गठबंधन की राजनीति का दौर

Advertisements

भारतीय जनता लंबे अरसे से राजनीति में बेहतर विकल्प के अभाव के कारण विवशता की स्थिति से गुजर रही है। उसे या तो कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन को चुनना पड़ता है या भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन को। लेकिन गठबंधन की राजनीति से सत्ता हासिल हो सकने की संभावना अब अधिक से अधिक केवल एक बार और है। अगली बार के  चुनाव में हो सकता है कि भाजपा के नेतृत्व वाला गठबंधन सत्ता में आ जाए। लेकिन उसके बाद 2013 के आसपास जो चुनाव होंगे, उसमें किसी भी राजनीतिक दल अथवा गठबंधन के लिए लोकसभा में बहुमत सिद्ध कर पाना कठिन होगा और देश में अभूतपूर्व संवैधानिक संकट की स्थिति उभरने के पूरे आसार हैं।दरअसल होता यह है कि राजनीतिक दल विचारधारा की सहमति के बजाय सत्ता हासिल करने के लिए गठबंधन करते हैं। गठबंधन के समीकरण का खेल चुनाव के नतीजे आ जाने के बाद शुरू होता है और जिस समीकरण का गणित बहुमत हासिल करने में सफल रहता है वह सत्ता में आ जाता है। वाजपेयी जी के नेतृत्व वाली पहली और दूसरी सरकारें इस समीकरण में नाजुक-सा फेरबदल होते ही धराशायी हो गयी थी। नरसिंह राव के जमाने से लेकर अब तक भारत में सत्ता की राजनीति गठबंधन के इसी नाजुक समीकरण के खेल का नतीजा है। मौजूदा सरकार भी वामपंथी दलों के बाहरी समर्थन पर टिकी हुई है और समाजवादी पार्टी का उसे अपरोक्ष सहयोग भी हासिल है। डी.एम.के., ए.आई.डी.एम.के., पी.एम.के., टी.डी.पी. जैसी क्षेत्रीय पार्टियाँ सत्ता के लिए अपना पाला कब बदल लें, कहा नहीं जा सकता।  लेकिन ऐसा लंबे समय तक नहीं चल सकेगा।

कल्पना कीजिए कि 2013 के आसपास जो आम चुनाव होंगे उसमें किसी भी राजनीतिक दल या गठबंधन को, चाहे वह चुनाव पूर्व हो या पश्चात हो, किसी भी समीकरण से बहुमत नहीं मिले तो क्या होगा? अगर दोबारा चुनाव कराए जाएँ फिर भी किसी को बहुमत नहीं मिले तब? राज्यों में जब ऐसा होता है तब राष्ट्रपति शासन लगा दिए जाने का संवैधानिक प्रावधान है। लेकिन केन्द्र में राष्ट्रपति शासन का कोई संवैधानिक प्रावधान नहीं है। भारत के संविधान में ऐसी किसी स्थिति के लिए कोई प्रावधान नहीं किया गया है।एक विकल्प यह हो सकता है कि चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी के नेता अथवा किसी सर्वमान्य नेता के नेतृत्व में राष्ट्रीय सरकार बनाया जा सकता है जिसमें सभी दलों के सांसदों को आनुपातिक आधार पर स्थान दिया जाए। लेकिन ऐसे किसी विकल्प के लिए संविधान में अभूतपूर्व परिवर्तन करना पड़ेगा, जिसके लिए किसी राजनीतिक दल की मानसिक तैयारी नहीं है। नास्त्रेदमस ने भी भारत में इस तरह के संवैधानिक संकट आने की भविष्यवाणी की थी और मौजूदा परिस्थितयों को देखते हुए इसके सच होने के काफी आसार दिख रहे हैं।

 भारत में सैनिक शासन की संभावना तो ख़ैर कतई नहीं है, लेकिन संसदीय प्रणाली की जगह राष्ट्रपति प्रणाली को अपनाने की दिशा में कुछ अवश्य किया जा सकता है। वर्तमान स्थिति यह है कि संसदीय प्रणाली पर आधारित प्रजातांत्रिक व्यवस्था को उच्चतम न्यायालय ने संविधान की मूलभूत विशेषताओं में शामिल किया हुआ है, जिसे बदलने का अधिकार संसद को भी नहीं दिया गया है। यदि संसद इस प्रकार का कोई संशोधन करना भी चाहे तो उसे उच्चतम न्यायालय ख़ारिज कर देगा। लेकिन पहली बात तो यह है कि हमारे राजनेता राष्ट्रपति प्रणाली को अपनाने के विकल्प के बारे में तब तक कुछ नहीं सोचेंगे जब तक संवैधानिक संकट सामने नहीं खड़ा हो जाएगा।आम जनता के लिए सोचने की बात यह है कि उसके पास ऐसा कौन-सा नेतृत्व है जो उसे ऐसे संवैधानिक संकट से उबारने में सफल हो सकेगा। वह कौन सा नेतृत्व होगा, जो भारत को विकसित राष्ट्रों की पंक्ति में ले जाएगा। 

Advertisements