गाँधी : एक पुनर्विचार

आज शहीद दिवस यानी गाँधीजी की शहादत की 58वीं पुण्य तिथि पर मेरा मन कुछ ऐसे सवालों की ओर जाता है, जो आज की नई पीढ़ी के लिए प्रासंगिक होते हुए भी अबूझ किस्म की हैं। गाँधीजी को याद करते हुए कुछ लोग कहते हैं कि आज भारत को फिर से किसी गाँधी की जरूरत है। महात्मा गाँधी ने अपने जीवन काल में, अपने समय की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए जो कुछ किया, क्या आज की परिस्थितियों में उन्हीं सिद्धांतों और तरीकों को दोहरा करके वर्तमान समस्याओं का समाधान किया जा सकता है ? मेरे मन में कई बार यह सवाल भी उठता है कि यदि आज गाँधीजी हमारे बीच जीवित होते तो क्या कर रहे होते ?

जैसा कि हम जानते हैं कि गाँधीजी अपने अंतिम दिनों में सांप्रदायिक हिंसा की विकराल समस्या से जूझ रहे थे और जब तमाम प्रयासों के बावजूद देश के विभाजन को टाल पाने और सांप्रदायिक हिंसा की लहर को थाम पाने में वह विफल रहे तो गंभीर आत्ममंथन के दौर से गुजरने के बाद वह ब्रह्मचर्य के विशेष प्रयोग करने की तरफ उन्मुख हो गए। उनका मानना था कि उनकी उपस्थिति के बावजूद यदि भारत में हिंसा का तांडव रूक नहीं पा रहा है तो इसका अर्थ है कि स्वयं उनके भीतर अहिंसा फलीभूत नहीं हुई। इस समस्या का समाधान उन्हें ब्रह्मचर्य की सफल साधना में दिखाई दिया। उनके मन में यह पौराणिक धारणा बद्धमूल हो चुकी थी कि इन्द्रियों पर पूरी तरह से विजय हासिल कर चुके व्यक्तियों के समक्ष सिंह और मेमने साथ-साथ एक ही घाट पर पानी पीते हैं। इस धारणा से प्रेरित होकर अपने जीवन भर के तमाम अन्य प्रयोगों की शृंखला के अंत में उन्होंने ब्रह्मचर्य संबंधी कुछ गोपनीय प्रयोग किए, लेकिन इससे पहले कि उन प्रयोगों का निष्कर्ष वह स्वयं निकाल पाते और दूसरों को बता पाते, उनकी एक ऐसे शख्स ने हत्या कर दी, जो किसी दूसरे अर्थ में उनसे इत्तफाक रखता था कि भारत में सारी हिंसा की जड़ में गाँधीजी ही थे। गाँधीजी के सामने संभवत: बुद्ध का आदर्श रहा होगा। जिस प्रकार बुद्ध ने अंगुलिमाल को अभय और अहिंसा के जरिए हिंसा और आतंक के मार्ग से विरत किया था, ठीक उसी तरह गाँधीजी भी सांप्रदायिक हिंसा के माहौल से उद्वेलित लोगों को आत्म-शुद्धि और आत्म-विजय के जरिए शांति एवं अहिंसा के मार्ग पर लाना चाह रहे थे। उनके सामने संभवत: ईसा का उदाहरण भी रहा होगा, जो दूसरों के पाप के लिए क्षमा दिलाने हेतु स्वयं सूली पर चढ़ गए। गाँधीजी वास्तव में समष्टि चेतना के गहन धरातल पर एक ऐसा परिवर्तन कर देना चाहते थे, जिसके परोक्ष असर से लोगों का मानस अपने-आप बदल जाए और उनका नैतिक उत्थान हो जाए। गाँधीजी की हत्या की ख़बर फैलते ही अचानक इस तरह का असर कुछ समय के लिए पैदा भी हुआ था और ऐसा लगा कि हिंसा का दौर अब थम जाएगा।

लेकिन ऐसा हो न सका, क्योंकि सत्ता-प्राप्ति की लालसा, जिसे मैं पदानुक्रम की होड़ कहता हूँ, हिंसा में ही सफलता का शार्टकट देखती है। जिन्ना सत्ता हासिल करना चाहते थे। उन्हें इस्लाम और मुसलमानों से कोई लेना-देना नहीं था। लेकिन चूँकि सांप्रदायिक आधार पर भारत-पाकिस्तान के विभाजन से उन्हें सत्ता मिल सकती थी, इसलिए लाखों लोगों को सांप्रदायिक दंगों की आग में झोंक देने में उन्हें कोई गुरेज नहीं हुआ। उधर, नेहरू किसी भी कीमत पर भारत के प्रधानमंत्री के पद से वंचित नहीं होना चाहते थे, इसलिए उन्हें भी जिन्ना के मातहत काम करने के बजाय देश का विभाजन श्रेयस्कर लगा। मेरा सोचना है कि गाँधीजी सांप्रदायिक हिंसा की समस्या को अपने ब्रह्मचर्य से जोड़ने की बजाय यदि पदानुक्रम के द्वंद्व से जोड़कर देखते तो शायद वह कुछ अधिक दूरगामी असर डाल पाते। हालाँकि गाँधीजी ने आजादी मिलने के बाद देश की सत्ता की बागडोर अपने हाथ में नहीं ली, बल्कि उन्होंने नेहरू को बाक़ायदा अपना उत्तराधिकारी घोषित करते हुए उनके हाथों में सत्ता सौंप दी। इस तरह देश में पदानुक्रम व्यवस्था यानी नंबर एक और नंबर दो के खेल का बीजारोपण स्वयं गाँधीजी ने ही किया। आज भारत में पदानुक्रम व्यवस्था इस तरह बद्धमूल ढंग से कायम हो चुकी है कि जीवन का कोई भी क्षेत्र इससे अछूता नहीं रह गया है।

फिर भी, गाँधीजी ने जिस नजरिए से अपने समय की परिस्थितियों का विश्लेषण किया और तत्कालीन जटिल समस्याओं के समाधान का मार्ग तलाशने की कोशिश की, उसका महत्व बहुत अधिक है। 21वीं शताब्दी के इस मोड़ पर हम दुनिया को जिस दशा और दिशा में पा रहे हैं, उसके पीछे अकेले गाँधी नामक कारक की वह भूमिका रही है, जो शायद बीसवीं शताब्दी की किसी अन्य परिघटना की नहीं रही। कोई चाहे तो इस बात को यों भी रख सकता है कि बीसवीं शताब्दी के घटनाक्रम ने मानव की समष्टिगत चेतना पर जो गुणात्मक असर डाला, गाँधी उसकी चरम निष्पत्ति थे।

गाँधीजी से पहले महामानवों के बारे में हमारी जो धारणा रही है वह अवतार, पैगंबर और दैवी कृपापात्र संतों एवं नायकों के रूप में रही है। लेकिन गाँधीजी पहले ऐसे व्यक्ति दुनिया में हुए जो इस बात के सबूत के रूप में आने वाले समय में देखे जाएंगे कि कोई सामान्य आदमी अपनी गलतियों से सीख करके, अपना लगातार परिमार्जन करके, अपने मनोबल एवं चरित्र बल के सहारे महानता की किन ऊँचाइयों तक पहुँच सकता है और जीवन की छोटी-छोटी बातों में सहज आत्म प्रेरणा के अनुरूप ईमानदारी से कार्य करते हुए कितने बड़े-बड़े उद्देश्यों को सफलतापूर्वक हासिल कर सकता है। हालाँकि अल्बर्ट आइंस्टीन जैसे महान वैज्ञानिक इस बात से आश्वस्त नहीं थे कि आने वाली पीढ़ियाँ गाँधी के बारे में पढ़-सुनकर यह विश्वास कर सकेंगी कि उनके जैसा हाड़-मांस का बना इंसान वास्तव में इस धरती पर कभी चलता-फिरता था।

लेकिन क्या गाँधीजी की चेतना का असर अब इतना क्षीण हो चुका है कि वह काल और परिस्थितियों की सीमाओं के परे काम नहीं कर सके? क्या मानवता का भविष्य इतना निराशाजनक है कि फिर से कोई आम आदमी अपने जीवन की परिस्थितियों का ईमानदारी और दृढ़ता से सामना करते हुए अपनी चेतना का महत्तम विकास नहीं कर सके ? सचाई तो यह है कि गाँधी की चेतना ने उन संभावनाओं के द्वार खोल दिए हैं जो मानवता का चिर प्रतीक्षित आदर्श रही हैं, जिसे आने वाली पीढ़ियाँ वास्तव में साकार होता देख सकेंगी।

गाँधीजी के संदर्भ में आज हम क्यों न इस बात पर विचार करें कि मानवता के जिन चिर प्रतीक्षित आदर्शों को साकार करने का लक्ष्य लेकर गाँधीजी आगे बढ़ रहे थे, उस दिशा में आगे की यात्रा को हम कैसे आगे जारी रख सकते हैं। मानवता के चिर-प्रतीक्षित आदर्श हैं – सत्य, प्रेम और न्याय। गाँधीजी मूलत: सत्य के शोधार्थी थे और अपनी शोधयात्रा में आगे बढ़ते हुए उनके सामने प्रेम का आदर्श भी दिखाई दिया, जिसे वह अहिंसा के माध्यम से प्राप्त कर सकने के लिए प्रयासरत रहे। अपनी आत्मकथा को गाँधीजी ने सत्य के प्रयोगों की संज्ञा दी है। लेकिन वह जानते थे कि सत्य एक तलवार की तरह है। युद्ध के मैदान में किसी योद्धा के पास केवल तलवार होना काफी नहीं है। उसके पास एक ढाल का होना भी जरूरी है। गाँधीजी की अहिंसा एक ढाल की तरह काम करती थी।

केवल सत्य के सहारे स्वतंत्रता हासिल तो की जा सकती है, लेकिन वैसी स्वतंत्रता केवल एकांत में ही हासिल हो पाती है और एकांत में ही सुरक्षित रह सकती है। क्योंकि दुष्ट प्रवृत्तियाँ इस दुनिया में किसी को स्वतंत्र रहने नहीं देना चाहती। यदि कोई अपनी स्वतंत्रता की रक्षा के लिए हिंसा का सहारा लेना चाहे तो उससे उसकी स्वतंत्रता खुद ही नष्ट हो जाती है। यही वजह है कि जो क्रांतिकारी स्वतंत्रता हासिल करने के लिए हिंसा का सहारा ले रहे थे, उन्हें गिरफ्तारी से बचने के लिए अपने को हमेशा छिपा कर रखने का प्रयास करना पड़ता था।

गाँधीजी के संपूर्ण जीवन-संग्राम की सबसे बड़ी उपलब्धि थी स्वतंत्रता। स्वतंत्रता के लिए उनका संघर्ष केवल ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध नहीं थे। उनका संघर्ष वास्तव में जनता के मन में दासता की सदियों पुरानी जड़ों को उखाड़कर उन्हें स्वतंत्र, स्वाभिमानी और आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्रेरित करने की दिशा में सक्रिय था। इसीलिए उन्होंने चरख़े का अपने रचनात्मक अस्त्र के रूप में व्यापक इस्तेमाल किया। भारत के इतिहास में पहली बार उनके ही नेतृत्व में ऐसा संभव हो पाया कि आम जनता ने स्वतंत्रता के मौलिक और जन्मसिद्ध अधिकारों को हासिल करने के लिए शासक वर्ग के विरुद्ध निर्भीक भाव से संगठित परंतु अहिंसक आवाज उठाई। गाँधीजी वास्तव में भारतवासियों को पहले स्वशासन और लोकतंत्र के लिए तैयार करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने आंदोलनों के साथ-साथ रचनात्मक कार्यक्रमों पर इतना अधिक बल दिया।

हमारे सामने यह सवाल भी है कि क्या हमें वैसी ही स्वतंत्रता मिली हुई है, जैसी गाँधीजी चाहते थे। हम गाँधीजी द्वारा दी गई कसौटी पर ही इसका मूल्यांकन करें तो इसका उत्तर मिल सकता है। गाँधीजी ने कसौटी दी थी: “जो सबसे गरीब और कमजोर आदमी तुमने देखा हो, उसकी शकल याद करो और अपने दिल से पूछो कि जो कदम उठाने का तुम विचार कर रहे हो, वह उस आदमी के लिए कितना उपयोगी होगा। क्या उससे उसे कुछ लाभ पहुँचेगा? ….यानि क्या उससे उन करोड़ों लोगों को स्वराज्य मिल सकेगा जिनके पेट भूखे हैं और आत्मा अतृत्प है ? ” आजादी के 58 साल बीत जाने के बाद हम महसूस कर रहे हैं कि यह आजादी केवल कुछ ही लोगों के सुख-साधन और सत्ता भोग के लिए है। सच तो यह है कि आजादी के बाद कई दशकों तक आजादी का वास्तविक लाभ गाँधीजी के नाम का इस्तेमाल करके जनता का वोट हासिल करने वालों ने किया। लेकिन उनके विचारों और रचनात्मक कार्यक्रमों को जानबूझकर उनलोगों ने नजरंदाज कर दिया। गाँधीजी जहाँ जीवन भर आम आदमी के हक़ और न्याय के लिए संघर्ष करते रहे, वहाँ आजादी के बाद की सारी राजनीति मूलत: सत्ता पाने और उसे येनकेनप्रकारेन बरकरार रखने के एकमात्र लक्ष्य के प्रति केन्द्रित रही।
यदि गाँधीजी आज जीवित होते, तो वह ठीक उसी प्रकार से मौजूदा सत्ता व्यवस्था के विरुद्ध व्यापक जनांदोलन चला रहे होते, जिस प्रकार उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध चलाया था। आज हमारे देश का राजनीतिक परिवेश और सामाजिक वातावरण जिस प्रकार भ्रष्टाचार और सांप्रदायिकता के अंध भँवर में लगातार फँसता जा रहा है, उससे मुक्ति दिलाने के लिए कई देशवासी फिर से गाँधी जैसी किसी शख़्सियत की जरूरत शिद्दत से महसूस कर रहे हैं। लेकिन कैरियर की प्रतिस्पर्धा और दूसरों को कुचलकर हर कीमत पर आगे बढ़ जाने की होड़ के मौजूदा माहौल में फिर से गाँधी जैसे व्यक्तित्व और चरित्र का प्रादुर्भाव कैसे हो ? अपनी अंतरात्मा की आवाज को सुनकर सत्य के मार्ग पर अडिग रहते हुए न्याय के लिए संघर्ष को निर्भीकता से जारी रखते हुए किसी के भी प्रति मन में तनिक भी हिंसा का भाव नहीं आने देने की उदात्तता भला अब किसमें आ सकती है ?

जिनके मन में गाँधीजी के सत्य और अहिंसा रूपी महान सिद्ध अस्त्रों पर आस्था बरकरार है, उन्हें ऐसी कोशिश जरूर करनी चाहिए। यदि हम सत्य और अहिंसा के माध्यम से पदानुक्रम व्यवस्था की जड़ पर कुठाराघात कर सके और उसके स्थान पर न्याय आधारित समानता के आदर्श की प्रतिष्ठा कर सके तो निश्चय ही हम गाँधीजी की परंपरा को आगे बढ़ा सकते हैं। हालाँकि भारत के संविधान की उद्देशिका में सभी नागरिकों की “प्रतिष्ठा और अवसर की समानता” को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है, लेकिन हमारी राजव्यवस्था और अर्थव्यवस्था जिस दिशा में बढ़ रही है वह भयंकर गैर-बराबरी पर आधारित है। हम लोकतांत्रिक मूल्यों के बजाय अन्यायमूलक पदानुक्रम सिद्धांत पर आधारित व्यवस्था को लागू करते जा रहे हैं। आज देश के प्रथम नागरिक और अंतिम नागरिक के बीच का वास्तविक फासला इतना अधिक हो गया है कि इसे लोकतंत्र कहा ही नहीं जा सकता।

इसलिए जो लोग भारतीय लोकतंत्र को बचाने और गाँधीजी के सपनों के भारत को बनाने के लिए सत्य और अहिंसा के अस्त्रों पर आस्था रखते हुए अपनी अंतरात्मा की आवाज को सुनकर आगे आना चाहते हैं, उन्हें संगठित होकर प्रयास करना चाहिए। यदि ऐसे कुछ सच्चे लोग अब भी संगठित होकर प्रयास करें तो वह दिन दूर नहीं जब सही अर्थों में गाँधी का स्वराज्य, जिसे वह “रामराज्य” कहा करते थे, हासिल हो जाएगा।

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One Response to गाँधी : एक पुनर्विचार

  1. snigdha says:

    i want about gandhi ka birth date what he studied and etc.

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