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इंतजार के पल

आज का दिन यूँ तो मित्रता दिवस के रूप में मनाया जाता है और दुनिया में पहली बार अमेरिका द्वारा हिरोशिमा पर परमाणु बम गिराए जाने की लोमहर्षक घटना के लिए याद किया जाता है, लेकिन मेरे जैसे चिट्ठाकार के लिए तो आज का दिन हिन्दी चिट्ठाकारिता के स्वर्णिम भविष्य के सूत्रपात का दिवस बनकर आया। जब सुबह काफी देर से आँख खुली, उस समय दस बजकर पचास मिनट हो रहे थे। घड़ी ने मुझे ख़बरदार किया कि ऐसा न हो कि तुम सम्मेलन में सबसे आख़िर में पहुँचो और तुम्हारे पहुँचने तक सारी चर्चा संपन्न हो जाए। लिहाज़ा चालीस मिनट के भीतर जल्दबाजी में तैयार हुए और साढ़े ग्यारह बजे निकल पड़े कनॉट प्लेस। बारह बजकर पाँच मिनट पर बरिस्ता पहुँचे तो कहीं कोई परिचित चेहरा नजर नहीं आया वहाँ। तो कोने की एक मेज पर इत्मीनान से जाकर बैठ लिए। सुबह में अख़बार नहीं पढ़ पाया था, इसलिए बैठकर हिन्दुस्तान टाइम्स के मुखपृष्ठ और संपादकीय पृष्ठ पढ़ डाले। इस बीच अमित जी, शशि जी, नीरज जी और जगदीश जी को भी फोन करके जानना चाहा कि उनको पहुँचने में कितनी देर लगने वाली है। नीरज जी का फोन वायस मेल बॉक्स में जा रहा था, इससे समझ में आ गया कि वह इस क़दर व्यस्त हैं कि बात भी नहीं कर सकते। अमित फोन नहीं उठा रहे थे, इससे मैंने अनुमान लगाया कि वह अभी बाइक चला रहे होंगे। शशि जी ने बताया कि पंद्रह-बीस मिनट में पहुँच रहे हैं और जगदीश जी ने बताया कि आधे घंटे लगेंगे। मैंने समय का सदुपयोग करते हुए आज के सम्मेलन के विचार-बिन्दुओं को नोटपैड पर सूत्रबद्ध करके रख लिया ताकि विचार-विमर्श के दौरान चर्चा मुद्दे से अधिक भटककर दूर नहीं जा पाए।

सम्मेलन की वैचारिक पृष्ठभूमि

आज का यह सम्मेलन मुम्बई के चर्चित हिन्दी चिट्ठाकार शशि जी की पहल पर आयोजित हो रहा था। वह दिल्ली में तीन दिनों के लिए आए हुए थे और उन्होंने दिल्ली के चिट्ठाकारों के साथ मिलन की इच्छा जताई थी। हालाँकि दिल्ली में हमलोग एक माह पहले ही, 4 जुलाई को एक सम्मेलन कर चुके थे और उसके बाद 8 जुलाई को भी जयपुर में हुए सम्मेलन में कई चिट्ठाकार आपस में मिल चुके थे और खूब सारी मौज-मस्ती करके आ चुके थे। इसलिए हमने इस सम्मेलन को मनोरंजन और आपसी परिचय से आगे बढ़कर, अब कुछ ठोस मुद्दों पर केन्द्रित करने की रूपरेखा बनाई। दरअसल हममें से कई चिट्ठाकारों के मन में हिन्दी चिट्टाकारिता के भावी स्वरूप के संबंध में लंबे अरसे से मंथन चल रहा था और हमलोग आपसी ऑनलाइन एवं टेलीफोन वार्ता में इसके विभिन्न पहलुओं पर चर्चा कर रहे थे। इस क्रम में देबू दा, शशि जी, जीतू जी, अनुनाद जी, नीरज जी और पंकज जी के साथ मेरी कई बार वार्ता हुई थी। पिछले दिल्ली सम्मेलन में भी नीरज जी और जगदीश जी के साथ अलग से मेरी इस विषय पर कुछ आरंभिक बातें हुई थीं। जीतू जी ने मेरे आग्रह पर अपने चिट्ठे पर अपने विचारों को बिंदुवार ढंग से रख दिया था ताकि इस विषय पर अन्य लोग भी अपने विचार व्यक्त करने के लिए प्रेरित हो सकें। उसके बाद मैंने भी अपने चिट्ठे पर हिन्दी चिट्टाकारिता के नवीन आयामों पर एक विहंगम दृष्टि डालने का प्रयास किया। देबू दा से भी मैंने इस विषय पर अपने विचार व्यक्त करने को कहा तो उन्होंने बताया कि इस मुद्दे पर शशि जी से उनकी पहले से चर्चा होती रही है और वह प्रस्तावित सम्मेलन में उनके विचारों का भी प्रतिनिधित्व करेंगे। कल 5 अगस्त को रवि रतलामी जी के जन्म-दिन पर अनूप भाई द्वारा लिए गए साक्षात्कार में भी यह मुद्दा छाया रहा था।  

सम्मेलन के प्रतिभागी

शशि जी ने इस सम्मेलन में अपने साथ दो अन्य हिन्दी चिट्ठाकारों के शामिल होने की सूचना दी थी, जिनमें से एक तो हैं सरोज सिंह, जिन्हें हम सभी दिल्ली ब्लॉग की लेखिका सुरके रूप में जानते हैं और दूसरे हैं प्रिय रंजन झा, जिन्होंने बिहारी बाबू कहिन नाम से दो महीने पहले ही एक रोचक चिट्ठा शुरू किया है। ये दोनों पत्रकार हैं और एक ही मीडिया संस्थान में कार्यरत हैं। अमित ने सूचित किया था कि उन्होंने दिल्ली के अंग्रेजी चिट्ठाकारों को भी इस सम्मेलन में आमंत्रित किया है। अमित के आमंत्रण पर आज अंग्रेजी में चतुष्पदियों के माध्यम से अर्ध सत्य का बयान करने वाले माया भूषण जी आए थे, जिनके चेहरे से तो नहीं परंतु नाम और काम से मैं पहले से ही परिचित था। वह भी संभवत: बारह बजे ही बरिस्ता पहुँच चुके थे और मेरी तरह बाकी लोगों का इंतजार कर रहे थे, लेकिन आपसी परिचय नहीं होने के कारण हमलोग एक-दूसरे की मौजूदगी से बेख़बर थे। वह स्टिंग ऑपरेशनों पर आधारित अपनी सनसनीखेज पत्रकारिता के कारण हाल ही में काफी चर्चित हुए हैं। आधे घंटे के इंतजार के बाद एक-एक करके साथी लोग आने शुरू हो गए। पहले अमित आए, फिर शशि और उनके साथ सरोज और प्रिय रंजन, अंत में जगदीश भाई। नीरज भाई कार्य की व्यस्तता की वजह से नहीं आ सके। जीतू जी ने कुवैत से अपने एसएमएस संदेश के जरिए उपस्थिति जताई। मुझे शामिल करके कुल मिलाकर सात चिट्ठाकार आज के सम्मेलन में प्रत्यक्ष रूप से शरीक हुए। सम्मेलन में खींचे गए फोटो पर दृष्टिपात करने के लिए अमित के चिट्ठे पर मौजूद फोटो संग्रह में जा सकते हैं, जहाँ आज की तारीख वाले चार फोटो दिख जाएँगे। जगदीश भाई ने भी इस सम्मेलन के संबंध में कुछ रोचक बातें अपने आइने में दर्शायी हैं।   

हुआ आग़ाज़ एक नए दौर का  

सम्मेलन में जिन विचार बिन्दुओं पर विस्तार से चर्चा हुई और जिस भावी परियोजना की रूपरेखा बनी, उसके संबंध में शशि जी व्यवस्थित ढंग से एक प्रविष्टि अलग से लिख रहे हैं। हमलोगों ने हिन्दी चिट्ठाकारिता के भविष्य के कुछ सुनहरे सपने देखे हैं और हमलोग मिल-जुलकर उन सपनों को अवश्य साकार करेंगे। इतना समझ लीजिए कि आज के सम्मेलन में हिन्दी चिट्ठाकारिता के नए दौर का आग़ाज़ हो चुका है। मेरी अगली कुछ प्रविष्टियाँ इसी विषय पर केन्द्रित रहेंगी, जिनमें धीरे-धीरे खुलासे किए जाएँगे।

अनौपचारिक लेखन 

चिट्ठाकारी (ब्लॉगिंग) को आम तौर पर अनौपचारिक लेखन ही माना जाता है। अनौपचारिकता शायद इसकी प्रकृति में ही है। जैसा कि मार्शल मैक्लुहान ने कहा है, माध्यम ही संदेश है”, हर माध्यम अपने द्वारा प्रसारित संदेश और पाठक, श्रोता अथवा दर्शक पर होने वाले उसके असर को एक विशिष्ट प्रकार से अनुकूलित करता है। ब्लॉग वेब पर प्रकाशन का एक ऐसा माध्यम है, जो लेखन को पाठक तक पहुंचाने और लेखक तथा पाठक के बीच परस्पर संवाद के लिए एक सहज, तत्क्षण और अनौपचारिक विकल्प प्रदान करता है।

कोई मध्यस्थ नहीं 

लेखन के इतिहास में ब्लॉग शायद पहला ऐसा माध्यम है जिसमें लेखक और पाठक के बीच में कोई मध्यस्थ नहीं है। यह लेखक और पाठक, दोनों के लिए सुकूनदायक है। किसी मध्यस्थ के माध्यम से अभीष्ट तक पहुँचना कितना पीड़ादायी है, इसे धूमिल ने अपनी प्रसिद्ध कविता में कुछ इस तरह से व्यक्त किया है

एक आदमी रोटी बेलता है

एक आदमी रोटी खाता है

एक तीसरा आदमी भी है

जो न रोटी बेलता है न रोटी खाता है

वह सिर्फ रोटी से खेलता है

मैं पूछता हूँ कि यह तीसरा आदमी कौन है

मेरे देश की संसद मौन है।

पारंपरिक लेखन में लेखक और पाठक के बीच प्रकाशक, विक्रेता और समीक्षक आ जाते हैं। प्रकाशक और विक्रेता जहाँ लेखन से होने वाले मुनाफ़े को हड़पने के कारोबार में माहिर होते हैं, वहीं समीक्षक लेखन के मानक और लेखक के स्तर को कृत्रिम ढंग से निर्धारित करने के खेल के उस्ताद। यहाँ तक कि अंतर्जाल (इंटरनेट) आने के बाद जब वेबसाइटों के माध्यम से लेखक और पाठक के बीच की दूरी को मिटाने की क्रांतिकारी कोशिश शुरू हुई तब भी वेब प्रकाशन की तकनीकी जटिलता के कारण वेब डिजाइनरों और वेब डेवलपरों की सेवाओं का सहारा लेना आवश्यक ही रहा। वर्ष 1997 में ब्लॉग के आने के बाद से लेखक और पाठक के बीच मध्यस्थ की भूमिका लुप्त हो गई।

मुनाफ़ा और मानक का तत्व हट जाने, लेखन का सहज रूप से तत्क्षण प्रकाशित हो जाने की सुविधा मिल जाने और पाठक के बीच पैठ बना सकने के लिए पेशेवर विशेषज्ञता आवश्यक नहीं रह जाने के कारण ब्लॉग पारंपरिक लेखन की गंभीरता और औपचारिकता से अलग  लेखन की एक नई शैली के विकास का माध्यम बना, जिसकी प्रकृति अनौपचारिक, समूहवादी, परस्पर संवादी और लोकतांत्रिक है।

पत्रकारिता से तुलना  

पत्रकारिता में किया जाने वाला लेखन जहाँ दबाव में होता है, जिसमें डेडलाइन  के भीतर और सीमित शब्द-सीमा में लिखना अनिवार्य होता है, वहीं चिट्ठाकारिता मनमर्जी का लेखन है, जिसमें आप जब चाहें और जितना चाहें, लिख सकते हैं। पत्रकारिता में संपादकीय नीति के साथ-साथ मालिकों के व्यावसायिक हित का अंकुश पत्रकारों की स्वतंत्रता पर हावी रहता है। जबकि ब्लॉगिंग में आप इस तरह के अंकुशों से मुक्त होते हैं। हालाँकि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संबंध में कुछ प्रतिबंध संविधान-सम्मत [भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(2) के अंतर्गत] हैं जो चिट्ठाकारों पर भी समान रूप से लागू होते हैं। पत्रकारिता और चिट्ठाकारिता में एक और महत्वपूर्ण अंतर है। पत्रकारिता जहाँ सामूहिक कर्म है, वहीं चिट्ठाकारिता का स्वरूप अभी तक व्यक्तिगत ही रहा है। हालाँकि कुछ चिट्ठाकार मिलकर भी चिट्ठों पर लेखन करते हैं, लेकिन ऐसा व्यापक और पेशेवर ढंग से नहीं किया जाता।

व्यावसायिकता और सामूहिकता 

हिन्दी चिट्ठा जगत के नारद,  जितेन्द्र चौधरी जी ने हिन्दी चिट्ठाकारिता में व्यावसायिकता की संभावनाओं पर चर्चा की है। इस विषय के दो पहलू हैं। एक तो चिट्ठाकारिता के स्वरूप को व्यक्तिगत बनाए रखते हुए व्यावसायिक संभावनाओं के दोहन का प्रयास करना। दूसरा पहलू है, चिट्ठाकारिता को सामूहिक स्वरूप प्रदान करना, जिसमें पचास-सौ या उससे भी अधिक चिट्ठाकारों की टीम मिलकर काम करे। चूँकि हिन्दी चिट्ठाकारिता से विभिन्न कार्यक्षेत्रों से संबद्ध और दुनिया के विभिन्न शहरों में निवास कर रहे पेशेवर दक्षता वाले सैकड़ों लोग जुड़े हुए हैं, इसलिए इसे सामूहिक स्वरूप भी दिया जा सकता है। इस तरह के सामूहिक प्रयास से जिस महाब्लॉग का जन्म होगा, उसमें व्यावसायिकता को प्रबंधकीय कौशल के साथ अपनाने की गुंजाइश अधिक होगी। लेकिन व्यावसायिकता और सामूहिकता, ब्लॉगिंग के स्वभाव और चरित्र में गुणात्मक बदलाव ला देगा।

बदलाव का परिदृश्य

पिछले कुछ अरसे में कई बड़े वेबपोर्टलों और मीडिया संस्थानों ने ब्लॉग के क्षेत्र में कदम रखा है। याहू, गूगल, सिफी, एमएसएन, इंडियाटाइम्स, रेडिफ और सुलेखा जैसे वेब पोर्टलों के बाद अब आईबीएन और एनडीटीवी आदि जैसे मीडिया संस्थान भी ब्लॉगिंग के क्षेत्र में धमाकेदार ढंग से उतर चुके हैं। इनसे ब्लॉगरों के लिए नई संभावनाएँ खुली हैं। ये वेबपोर्टल और मीडिया ब्लॉग चिट्ठाकारों को नागरिक पत्रकार (सिटीजन जर्नलिस्ट) और वेब जर्नलिस्ट की भूमिका में समानांतर पत्रकारिता करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं और उस रिक्त स्थान की पूर्ति करने का प्रयास कर रहे हैं जिसे मुख्यधारा की पत्रकारिता नहीं भर पा रही है। खासकर संकट के समय, जैसे कि अंडमान-निकोबार में सुनामी और मुम्बई में बाढ़ और बम विस्फोट की वारदातों के दौरान, चिट्ठाकारिता का महत्व अधिक निखर कर सामने आया है। बहुत से पत्रकार मीडिया संस्थानों के व्यावसायिक हितों और संपादकीय नीति के दबाव से मुक्त होकर लिखने के लिए चिट्ठाकारिता का सहारा लेने लगे हैं। कई पत्रकार अंशकालिक रूप से और कुछ तो पूर्णकालिक रूप से चिट्ठाकारिता को अपना चुके हैं। धीरे-धीरे यह सिलसिला जोर पकड़ रहा है। खासकर पत्रकारिता का प्रशिक्षण हासिल करके निकल रहे युवा पत्रकारों में वेब पत्रकारिता और ब्लॉगिंग को अपनाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, जो तकनीकी रूप से कुशल और प्रशिक्षित हैं। उनमें से कई ब्लॉगिंग को ‘सोहो’ (स्मॉल ऑफिस होम ऑफिस) के रूप में अपनाने और घर बैठे रोजगार पाने की संभावनाएँ टटोल रहे हैं।

तेजी से बदल रहे इस परिप्रेक्ष्य में चिट्ठाकारिता के स्वभाव और चरित्र में गंभीरता आ रही है जो तत्व इसकी शुरुआती प्रकृति में नहीं था। ब्लॉग पर शब्दों के साथ-साथ फोटो, ऑडियो और वीडियो के प्रकाशन की सुविधा सहज हो जाने के कारण अब चिट्ठाकारिता अपने आप में एक संपूर्ण और स्वतंत्र विधा बनकर उभर रही है। आने वाले दिनों में इस बात की प्रबल संभावना है कि लोग रोजगार की दृष्टि से चिट्ठाकारिता को पेशेवर रूप से अपनाना शुरू करें। कुछ युवकों ने तो शुरुआत कर भी दी है और अब वे अच्छी कमाई भी करने लगे हैं। रविशंकर श्रीवास्तव, जो रवि रतलामी के नाम से हिन्दी ब्लॉग जगत में मशहूर हैं, संभवतया हिन्दी के पहले पूर्णकालिक चिट्ठाकार हैं। उन्होंने हिन्दी चिट्ठाकारिता की व्यावसायिक संभावनाओं को टटोलने और दोहन करने की शुरुआत की है।

अनपेक्षित हस्तक्षेप की आशंका 

लेकिन चिट्ठाकारिता में यदि व्यवसाय और मुनाफे का तत्व जुड़ेगा तो जाहिर है कि इसमें बिचौलिए भी अवश्य घुसेंगे, क्योंकि जहाँ कहीं मुनाफे की संभावना होती है बिचौलिए सूँघकर उसमें घुसपैठ कर जाते हैं और फिर तेजी से उस क्षेत्र पर कब्जा कर लेते हैं। यदि चिट्ठाकारिता के साथ ऐसा होता है तो बहुत घातक होगा। इसके अलावा, उस परिस्थिति में चिट्ठाकारिता आय कर और सेवा कर के दायरे में भी आ जाएगी। क्या हम ऐसा होने से रोक सकेंगे? जो लोग कंसल्टेंसी एवं कंटेन्ट प्रोवाइडर फर्म की तर्ज पर ब्लॉगिंग से संबंधित सेवाएँ शुरू करने की दिशा में सोच रहे हैं, उन्हें इस पहलू पर भी विचार करना चाहिए। 

प्रतिबंध के सबक 

हाल ही में संचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के एक आदेश के तहत कुछ चिट्ठों पर पाबंदी लगाने के प्रयास में इंटरनेट सेवा प्रदाताओं ने कई लोकप्रिय ब्लॉग सेवाओं को प्रतिबंधित कर दिया था, जिसकी वजह से लाखों ब्लॉगरों को दिक्कत हुई थी। मीडिया और ब्लॉगर समुदाय के कड़े प्रतिरोध के बाद वह प्रतिबंध तो अधिकांशत: हटा लिया गया, लेकिन हो-हल्ला शांत हो जाने के बाद कुछ इंटरनेट सेवा प्रदाताओं ने यह पाबंदी फिर से लगा दी है, जिसमें भारत सरकार का राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केन्द्र (एन.आई.सी.) भी शामिल है, जिसकी पहल पर पाबंदी की उक्त कार्रवाई की गई थी। हमारे नौकरशाह निषेधात्मक कार्रवाई करने के मामले में गजब की चुस्ती और उत्साह का परिचय देते हैं। ऐसा करके लोगों को परेशान करने में उन्हें परमानंद रस की प्राप्ति होती है। इस पाबंदी से एक बात तो जाहिर हो गई है कि सरकार अब ब्लॉगिंग को अत्यंत गंभीरता से ले रही है और इसके दुरुपयोग की आशंकाओं के प्रति कुछ अधिक सक्रियता से सचेत है। इसलिए हमें आत्मसंयम और सकारात्मक चिंतन के साथ चिट्ठाकारिता को आगे बढ़ाने की विशेष जरूरत है। इसको ध्यान में रखते हुए चिट्ठाकारों के लिए आदर्श आचार संहिता को अपनाया जाना जरूरी है। नारद ने इस तरह की संहिता तैयार करने की दूरदर्शिता दिखाकर प्रशंसनीय पहल की है।

मेरी सोच 

वर्ष 2004 में गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने युवकों को भारत-2020 के मिशन की दिशा में कार्य करने के लिए आगे आने का आह्वान किया था। उसी से प्रेरित होकर मैंने चिट्ठाकारिता की तरफ कदम बढ़ाए। आरंभ मैंने अंग्रेजी से किया, लेकिन बाद में अनुभव हुआ कि हिन्दी में चिट्ठाकारी अधिक प्रभावी और उपयोगी सिद्ध होगी। मैं समझता हूँ कि यदि अधिक से अधिक प्रतिबद्ध चिट्ठाकार मिलकर भारत-2020 के लक्ष्य की दिशा में कार्य कर सकें तो हम शायद कोई महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल कर सकेंगे। पत्रकारिता भी शुरुआती दौर में मिशन के भाव से प्रेरित हुई थी। व्यावसायिकता का समावेश उसमें बाद में हुआ। हम हिन्दी चिट्ठाकारिता की शुरुआत भी इसी तरह से कर सकते हैं। मिशन चिट्ठाकारी हमें समाज और राष्ट्र में जिम्मेदार और कारगर भूमिका निभाने वाले प्रभावशाली वर्ग के रूप में स्थापित करेगा, जिससे ब्लॉगिंग की साख बढ़ेगी। जिस तरह से हम पत्रकारिता के इतिहास का अध्ययन करते समय स्वतंत्रता आंदोलन में भारतीय भाषायी पत्रकारिता के योगदान को याद करते हैं, उसी तरह भारत को विकसित देश का दर्जा दिलाने के अभियान में हिन्दी चिट्ठाकारिता की भूमिका हो सकती है। रोजी-रोटी के लिए और अपनी भौतिक प्रगति के लिए हम पहले से किसी न किसी पेशे में कार्यरत हैं ही, हमें अपने व्यक्तिगत आय के लिए चिट्ठाकारिता को अपना मुख्य पेशा बनाने की आवश्यकता शायद नहीं है। फिर भी, हिन्दी चिट्ठाकारिता की व्यावसायिक संभावनाओं का पता लगाया जाना चाहिए और यथासंभव आय प्राप्ति की कोशिश करनी चाहिए। चिट्ठाकार चाहें तो वे अपने चिट्ठे के माध्यम से अपनी विशेषज्ञता के क्षेत्र में ऑनलाइन सेवा प्रदान करके भी आय प्राप्त कर सकते हैं। मैं स्वयं वैकल्पिक न्याय (अल्टरनेटिव डिस्प्यूट रिजॉल्यूशन) के क्षेत्र में इस तरह की सेवा शीघ्र ही शुरू करने जा रहा हूँ। हिन्दी चिट्ठाकारों को इस तरह से प्राप्त  होने वाली अतिरिक्त आय को किसी साझे कोष में जमा किया जा सकता है, जिसे भारत-2020 के लक्ष्य के लिए समुचित रूप से व्यय किया जा सकता है। यदि हम ऐसा करना चाहें तो इसके लिए हम एक ट्रस्ट की स्थापना कर सकते हैं। ऐसा करके हम आय कर विभाग और बिचौलियो के अनचाहे हस्तक्षेप से भी चिट्ठाकारिता को बचा सकेंगे। 

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