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संसद के मानसून सत्र के दौरान सरकार ने नौकरशाही के दबाव के सामने झुकते हुए सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 में संशोधन करके फाइल नोटिंग्स को सूचना के दायरे से बाहर निकालने की विफल चेष्टा की। यदि सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 2 (च) में दी गई ’सूचना’ की निम्नलिखित परिभाषा को देखा जाए,

“information” means any material in any form, including records, documents, memos, e-mails, opinions, advices, press releases, circulars, orders, logbooks, contracts, reports, papers, samples, models, data material held in any electronic form and information relating to any private body which can be accessed by a public authority under any other law for the time being in force; 

तो इसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि अभिलेख, दस्तावेज, ज्ञापन, अभिमत, सलाह, परिपत्र, आदेश, आदि सहित किसी भी रूप में उपलब्ध सामग्री सूचना के अंतर्गत आती है। लेकिन समस्या तब उत्पन्न हुई जब भारत सरकार के कार्मिक मंत्रालय ने अपनी वेबसाइट पर सूचना का अधिकार के संबंध में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ) के अंतर्गत सूचना की परिभाषा को निम्नानुसार स्पष्ट करते समय अपनी ओर से जोड़ दिया कि इसके अंतर्गत फाइल नोटिंग्स नहीं आती है: 

3. What does information mean?     Information means any material in any form including records, documents, memos, e-mails, opinions, advices, press releases, circulars, orders, logbooks, contracts, reports, papers, samples, models, data material held in any electronic form and information relating to any private body which can be accessed by a public authority under any other law for the time being in force but does not include “file notings” [S.2(f)].

चूँकि भारत सरकार के सरकारी कामकाज से जुड़े नियमों से संबंधित किसी भी भ्रांति के मामले में कार्मिक मंत्रालय का स्पष्टीकरण ही अंतिम और स्वीकार्य माना जाता है, इसलिए कार्मिक मंत्रालय द्वारा मूल अधिनियम की भावना के विपरीत अपनी वेबसाइट पर दिए गए उक्त स्पष्टीकरण से दुविधा उत्पन्न हो गई। जाहिर है कि कार्मिक मंत्रालय, जो भारत सरकार के समूचे नौकरशाही तंत्र को नियंत्रित करता है, द्वारा अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर और संसद की मर्यादा को भंग करते हुए जब उक्त स्पष्टीकरण के द्वारा सूचना के अधिकार को अप्रभावी करने की कोशिश की गई तो उसे केन्द्रीय सूचना आयोग में चुनौती दी गई। इस चुनौती पर सुनवाई करने के बाद मुख्य सूचना आयुक्त श्री वजाहत हबीबुल्लाह ने 31 जनवरी, 2006 को अपने आदेश के द्वारा स्पष्ट किया कि फाइल नोटिंग्स के बगैर कोई भी सूचना अपूर्ण है, इसलिए फाइल नोटिंग्स सूचना का हिस्सा हैं। सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के अनुसार सूचना का अधिकार संबंधी सभी प्रकार के विवादों के मामले में मुख्य सूचना आयुक्त का निर्णय ही अंतिम और बाध्यकारी होता है, लिहाजा नौकरशाहों के लिए उस आदेश को शिरोधार्य करना बाध्यकारी हो गया है, जिसके अनुसार कोई व्यक्ति फाइल नोटिंग्स को देख सकता है और प्रासंगिक अंशों की फोटोप्रति निर्धारित शुल्क का भुगतान करके हासिल कर सकता है।  

फाइल नोटिंग्स को सूचना के अधिकार के तहत उपलब्ध कराना बाध्यकारी बना दिए जाने के बाद नौकरशाहों की नींद हराम हो गई और उसने लॉबिंग करके केन्द्रीय मंत्रिमंडल पर दबाव बनाया कि सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 में एक संशोधन के जरिए फाइल नोटिंग्स को सूचना के दायरे से बाहर कर दिया जाए और इसके लिए बहाना यह किया गया कि मूल अधिनियम से कुछ भ्रांति पैदा हो रही थी जिसे दूर किए जाने के लिए यह संशोधन प्रस्तावित है, जबकि वास्तविकता यह है कि भ्रांति सरकार ने अपनी तरफ से पैदा करने की कोशिश की थी। मंत्रियों को संशोधन संबंधी प्रस्ताव से सहमत करने के लिए नौकरशाहों ने कैबिनेट पेपर्स को भी सूचना के दायरे से बाहर रखे जाने का प्रस्ताव किया, ताकि केन्द्रीय मंत्रिमंडल द्वारा संसद और जनता को विश्वास में लिए बगैर किए जाने वाले निर्णय के पीछे वास्तविक तथ्यों और कारणों का खुलासा किए जाने की बाध्यता समाप्त की जा सके। सरकार नौकरशाहों के दबाव और चाल में फँस कर झुक गई और उसने नौकरशाही द्वारा वांछित संशोधन करने का फैसला कर लिया। लेकिन इसकी जनता एवं बुद्धिजीवी वर्ग में तीव्र प्रतिक्रिया हुई और भारी जनमत के दबाव के सामने सरकार को प्रस्तावित संशोधन को फिलहाल टालने के लिए बाध्य होना पड़ा। लेकिन नौकरशाही चुप रहने वाली नहीं है, वह टेढ़ी चाल चलकर सूचना के अधिकार को बेमानी बनाने की हर संभव कोशिश कर रही है। एक चाल तो प्रधानमंत्री कार्यालय के अधिकारियों ने 26 जुलाई को यह दिलासा देकर चलने की कोशिश की कि प्रस्तावित संशोधनों से सूचना का अधिकार कानून अधिक मजबूत होगा और सामाजिक एवं विकास परियोजनाओं से संबंधित फाइल नोटिंग्स को देखने का अधिकार जनता के पास होगा। लेकिन जनता नौकरशाहों की चाल में नहीं आई और उसके प्रतिरोध के सामने सरकार को झुकने के लिए फिलहाल बाध्य होना पड़ा है।

अब सरकार जनता द्वारा व्यक्त की गई आपत्तियों का अध्ययन करवा रही है और इस बात की पूरी आशंका है कि भारत सरकार के घाघ नौकरशाह अपने शब्दजाल से ऐसे उपाय निकालने की पूरी कोशिश करेंगे ताकि सूचना के अधिकार संबंधी कानून में उनके लिए वांछित संशोधन किए जा सकें। इसलिए भारत के सजग नागरिकों को सतर्क और एकजुट रहने की आवश्यकता है। भारत की जनता को अगले आम चुनाव के दौरान सूचना के अधिकार पर राजनीतिक दलों की नीति के आधार पर मतदान का फैसला करना होगा। नौकरशाहों और राजनेताओं को यह अहसास करा देना होगा कि भारत में अब ऐसी किसी सरकार को सत्ता में आने नहीं दिया जाएगा जो सूचना के अधिकार में कटौती करने की हिमाकत करने की सोच रही हो। 

आइए, सूचना के अधिकार को बचाने के अभियान में आप भी शामिल होइए और इसके लिए प्रधानमंत्री को भेजे जा रहे ऑनलाइन अभ्यावेदन पर हस्ताक्षर कीजिए। सूचना के अधिकार संबंधी भारत सरकार के आधिकारिक वेब पोर्टल http://rti.nic.in/ अथवा http://rti.gov.in/ से आप इस अधिकार के बारे में विस्तृत विवरण प्राप्त कर सकते हैं।  

(यह पोस्ट मृत्युंजय जी के प्रश्न के उत्तर के तौर पर लिखी गई है, जिन्होंने सूचना के अधिकार संबंधी मेरी एक पिछली प्रविष्टि पर टिप्पणी करते हुए फाइल नोटिंग्स के मुद्दे पर जिज्ञासा व्यक्त की थी।)

ऑनलाइन जगत में हिन्दी 

हिन्दी दुनिया की तीसरी सर्वाधिक बोली-समझी जाने वाली भाषा है। विश्व में लगभग 80 करोड़ लोग हिन्दी समझते हैं, 50 करोड़ लोग हिन्दी बोलते हैं और लगभग 35 करोड़ लोग हिन्दी लिख सकते हैं। लेकिन इंटरनेट पर हिन्दी काफी पिछड़ी अवस्था में है। ग्लोबल रीच द्वारा सितम्बर, 2004 में जारी भाषा पर आधारित विश्व की ऑनलाइन आबादी के आँकड़ों में शामिल 34 भाषाओं की सूची में हिन्दी को स्थान भी नहीं दिया गया था। वर्ष 2005 में भी ऑनलाइन जगत की 10 सबसे लोकप्रिय भाषाओं में हिन्दी को स्थान नहीं मिल सका। तेजी से विकसित हो रही गैर-अंग्रेजी ऑनलाइन भाषाओं में चीनी, जापानी, स्पेनिश, जर्मन, कोरियन, फ्रेंच, इटालियन, डच और पुर्तगाली प्रमुख हैं, जबकि हिन्दी अन्य गैर-अंग्रेजी ऑनलाइन भाषाओं में शामिल है। ऑनलाइन जगत में हिन्दी के पिछड़ने का प्रमुख कारण यह है कि इंटरनेट से जुड़े भारतीय अपने ऑनलाइन कामकाज में अंग्रेजी का प्रयोग करते रहे हैं। हालाँकि भारत में इंटरनेट से जुड़े लोगों की संख्या में तेजी से वृद्धि हो रही है और इंटरनेट विश्व सांख्यिकी के ताजा आँकड़े बताते हैं कि भारत में जून, 2006 तक 5 करोड़ 60 लाख इंटरनेट प्रयोक्ता हो चुके हैं और भारत अब अमरीका, चीन और जापान के बाद इंटरनेट से जुड़ी आबादी के मामले में चौथा स्थान हासिल कर चुका है।  ब्रॉडबैंड इंटरनेट कनेक्शनों की संख्या भारत में 15 लाख हो चुकी है। भारत में अब हर दो कंप्यूटर प्रयोक्ताओं में से एक इंटरनेट से जुड़ चुका है। इंटरनेट का प्रयोग बढ़ने के साथ-साथ ऑनलाइन हिन्दी की स्थिति भी बेहतर हो रही है। इंटरनेट पर हिन्दी के जालस्थलों और चिट्ठों की संख्या तेजी से बढ़ रही है और जक्स्ट कंसल्ट द्वारा जुलाई, 2006 में जारी ऑनलाइन इंडिया के आँकड़ों से पता चलता है कि ऑनलाइन भारतीयों में से 60% अंग्रेजी पाठकों की तुलना में 42% पाठक गैर-अंग्रेजी भारतीय भाषाओं में और 17% पाठक हिन्दी में पढ़ना पसंद करते हैं। हालाँकि पाठकों का यह रुझान ज्यादातर जागरण, बी.बी.सी. हिन्दी और वेबदुनिया जैसे लोकप्रिय हिन्दी वेबसाइटों की तरफ ही है, जिन्हें रोजाना लाखों हिट्स मिलते हैं।  

हिन्दी चिट्ठाकारी की स्थिति 

चिट्ठाकारी (ब्लॉगिंग) भारत में तेजी से लोकप्रिय हो रहा है और 85% भारतीय नेटिजन नियमित रूप से ब्लॉग पढ़ते हैं। किंतु हिन्दी चिट्ठों का संसार अभी उतना व्यापक नहीं हो पाया है। चिट्ठा विश्व के मुताबिक भारतीय चिट्ठों में अब तक केवल 7% ही हिन्दी में हैं। हिन्दी चिट्ठों की संख्या फिलहाल लगभग 400 है जिनमें से नारद के माध्यम से 326 चिट्ठों की ख़बर मिलती रहती है। लोकप्रिय माने जाने वाले हिन्दी चिट्ठों पर प्रकाशित किसी नई प्रविष्टि को औसतन सौ हिट्स मिलते हैं और उनको मिलने वाली प्रतिक्रियाओं की संख्या शायद ही कभी 30 से ऊपर जा पाती है। हिन्दी चिट्ठों के ज्यादातर पाठक अभी तक वे चिट्ठाकार हैं जो नारद और चिट्ठा विश्व जैसे हिन्दी चिट्ठा संकलकों के माध्यम से अन्य चिट्ठाकारों के विचारों से रूबरू होते रहते हैं। सर्च इंजन अथवा अन्य माध्यमों से स्वतंत्र रूप से हिन्दी चिट्ठों तक पहुँचने वाले नये पाठकों की संख्या बहुत कम ही है। फिर भी, अच्छी बात यह है कि शुरुआती दौर में ही हिन्दी चिट्ठों का दायरा विश्व पटल के काफी बड़े हिस्से में फैल चुका है। हिन्दी के चिट्ठाकार मुख्य रूप से भारत के अलावा संयुक्त राज्य अमरीका, कनाडा, जर्मनी, इटली, फ्रांस, स्वीटरजरलैंड, आस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, रूस, सिंगापुर, कुवैत, संयुक्त राज्य अमीरात और फिलीपींस आदि देशों में सक्रिय हैं। भारत के ज्यादातर राज्यों में हिन्दी चिट्ठाकारों की मौजूदगी देखी जा सकती है जिसमें हिन्दी भाषी राज्यों के अलावा दक्षिण और पश्चिम भारत के राज्यों में उनकी सक्रियता विशेष रूप से उल्लेखनीय है।  विश्व में हिन्दी भाषियों की विशाल संख्या और इंटरनेट पर हिन्दी के निरंतर बढ़ रहे प्रयोग को देखते हुए हिन्दी चिट्ठाकारिता का भविष्य अत्यंत उज्ज्वल दिखता है, हालाँकि हिन्दी चिट्ठे अब तक ऑनलाइन हिन्दी पाठकों के बहुत बड़े वर्ग तक नहीं पहुँच पाए हैं। लेकिन हिन्दी चिट्ठाकारिता का सबल पक्ष है कलम के धनी और तकनीकी रूप से कुशल प्रतिभाशाली चिट्ठाकारों का इससे जुड़ा होना। लेकिन इससे भी अधिक महत्वपूर्ण है स्वदेश भारत और स्वभाषा हिन्दी के प्रति सबका अनन्य प्रेम, जो उन्हें एकसूत्र में बाँधता है और इंटरनेट पर हिन्दी को गौरवपूर्ण स्थान दिलाने के लिए निरंतर सचेष्ट रहने हेतु प्रेरित भी करता है। हिन्दी चिट्ठाकारों द्वारा शुरू किए गए अक्षरग्राम, नारद, सर्वज्ञ, निरंतर, परिचर्चा, शून्य, ब्लॉगनाद, बुनो कहानी और अनुगूँज जैसे उल्लेखनीय सहकारी प्रयासों से हिन्दी चिट्टाकारिता के भविष्य के प्रति आशा बलवती होती है। भारत और दुनिया के विभिन्न शहरों में हिन्दी चिट्ठाकारों के अक्सर होते रहने वाले सम्मेलन उनकी सजगता और सक्रियता को बढ़ाते हैं। 

व्यावसायिकता और सरोकार

हिन्दी चिट्ठाकारिता को व्यावसायिकता से जोड़े जाने और चिट्ठों पर विज्ञापन रखे जाने की बात करते समय हिन्दी चिट्ठों की प्रसार संख्या का सवाल बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। कारोबार और विज्ञापन जगत की दृष्टि में हिन्दी चिट्ठों ने अभी तक वह ताकत हासिल नहीं की है जिसके आधार पर मीडिया संस्थान और विज्ञापन कंपनियाँ हिन्दी चिट्ठों की ओर आकर्षित हो सकें। रवि रतलामी जैसे चर्चित हिन्दी चिट्ठाकार ने हिन्दी चिट्ठों को व्यावसायिकता से जोड़ने की दिशा में जो पहल की है वह महत्वपूर्ण है। व्यावसायिकता का एक प्रमुख तत्व है प्रतिस्पर्धा और बहुत-से लोग मानते हैं कि प्रतिस्पर्धा से गुणवत्ता (क्वालिटी) का विकास होता है और परिमाण (क्वांटिटी) में वृद्धि होती है। बहुत संभव है कि हिन्दी चिट्ठाकारिता में व्यावसायिकता और प्रतिस्पर्धा का तत्व जुड़ने के बाद उसकी गुणवत्ता में बेहतरी और परिमाण में बढ़ोतरी देखने को मिले। हालाँकि ई-स्वामी और मितुल जैसे कुछ चिट्ठाकार इससे भिन्न राय रखते हैं और हिन्दी चिट्ठाकारिता को ओपन सोर्स और विकिपीडिया की तरह की परियोजनाओं के माध्यम से आगे बढ़ाने का इरादा रखते हैं। जीतेन्द्र चौधरी और शशि सिंह जैसे हिन्दी चिट्ठाकार मीडिया कंपनियों को मांग के आधार पर कंटेंट प्रदान करने की सेवा शुरू करने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं। मैं भारत-2020 के राष्ट्रीय मिशन के साथ हिन्दी चिट्ठाकारिता को जोड़े जाने तथा चिट्ठाकारों द्वारा अपनी विशेषज्ञता के क्षेत्र में ऑनलाइन सेवाएँ शुरू किए जाने पर विशेष बल दे रहा हूँ। इसके साथ-साथ स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसे राष्ट्रीय सरोकारों तथा सूचना के अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एवं अन्य मौलिक अधिकारों तथा संविधान में उल्लिखित नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों के साथ हिन्दी चिट्ठाकारिता को जोड़े जाने की जरूरत है। हिन्दी के पहले ब्लॉगजीन निरंतर का प्रकाशन फिर से शुरू करके हिन्दी के कुछ मूर्धन्य चिट्ठाकारों ने इस दिशा में अत्यंत ठोस कदम बढ़ाया है। आवश्यकता है ऐसे सहकारी प्रयासों को निरंतर आगे बढ़ाते रहने की। जो चिट्ठाकार साथी इस दिशा में  सक्रिय भूमिका निभाना चाहते हैं, उनसे मेरा विनम्र अनुरोध है कि इस लेख पर अपनी प्रतिक्रिया और सुझाव देने के साथ-साथ अपनी विशेषज्ञता एवं अभिरुचि के क्षेत्र का उल्लेख करते हुए हिन्दी चिट्ठाकारिता के भावी नवीन प्रयासों में अपनी सहभागिता के लिए सहमति भी व्यक्त करने की कृपा करें।

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