नहीं लगने देंगे सूचना के अधिकार में सेंध
July 25, 2006 by सृजन शिल्पी
फाइल पर नौकरशाहों द्वारा लिखे जाने वाले टिप्पण (नोटिंग्स) दरअसल उनकी असली ताकत हैं। हरे रंग की नोटशीट पर लिखे जाने वाले ये टिप्पण उनके विशेषाधिकार, विवेकाधिकार और निरंकुश सत्ता के मूल स्रोत हैं। अंग्रेजों द्वारा उन्नीसवीं शताब्दी में बनाया गया शासकीय गोपनीयता अधिनियम आज भी सरकारी अधिकारियों के मनमानेपन की वैधता का दस्तावेज बना हुआ है। हरे रंग की नोटशीट पर सरकारी अधिकारियों द्वारा लिखे जाने वाले टिप्पण गोपनीय श्रेणी में आते थे। लेकिन सूचना का अधिकार अधिनियम के द्वारा आम जनता को फाइल नोटिंग्स को देख सकने का अधिकार मिल जाने के बाद नौकरशाहों की नींद हराम हो गई थी। इसलिए शीर्ष पदों पर बैठे तमाम नौकरशाहों ने एक सुर में सरकार पर दबाव बनाया कि फाइल नोटिंग्स को सूचना के अधिकार के दायरे से बाहर रखा जाए। सरकार ने इस दबाव के सामने घुटने टेक दिए। ये राजनेता और नौकरशाह कभी नहीं चाहते कि आम जनता के हाथ में ताकत आए। सूचना के अधिकार के दायरे से फाइल नोटिंग्स को बाहर रखने संबंधी मंत्रिमंडल के निर्णय को यदि संसद का अनुमोदन हासिल हो गया तो फिर सूचना का अधिकार कानून बेमानी होकर रह जाएगा। ये नौकरशाह गोलमोल बातें बनाकर सच को छिपाने की कला में माहिर हैं। वे नहीं चाहते कि फाइल पर उनके द्वारा लिए गए किसी निर्णय के पीछे वास्तविक कारणों को पारदर्शी बनाया जाए और किसी पक्षपात या चूक के लिए अधिकारियों की जवाबदेही को सुनिश्चित किया जाए। जो लोग सूचना के अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की कीमत समझते हैं उन्हें सरकार और नौकरशाहों के मंसूबों को विफल करने के लिए तुरंत रणनीतिक उपाय करने चाहिए। सूचना का अधिकार हमारे लोकतंत्र की अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धि है और यह अधिकार हमें लंबे संघर्ष के बाद हासिल हुआ है। आम जनता और प्रेस एवं मीडिया को हर संभव कोशिश करनी चाहिए और भरपूर दबाव बनाना चाहिए ताकि संसद में सूचना का अधिकार अधिनियम में संशोधन पारित नहीं हो सके।








(संपादित)
एक हाथ से देकर दूसरे हाथ से छीन लिया गया ये अधिकार. हैरत की बात यह है कि चंद चैनल और अख़बारों ने ही इसे मुद्दा बनाया है. सूचना आयुक्त तक सरकार के इस क़दम पर नाराज़ हैं. अन्ना हज़ारे जिन्होंने सूचना के अधिकार को हासिल करने के लिए लंबी लड़ाई लड़ी उन्होंने भी धमकी दी है कि यदि ऐसा किया जाता है तो वे पदम सम्मान लौटा देंगे. हम ब्लॉगिए इस मसले पर किस तरीक़े का विरोध कर सकते हैं?
अख़बार और समाचार चैनल नागरिकों को प्राप्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सूचना का अधिकार संबंधी कानूनी उपबंधों का सहारा लेकर ही पत्रकारिता का अपना कारोबार चलाते हैं, उनके पास अलग से कोई ऐसा लाइसेंस या अधिकार नहीं होता जो आम जनता अथवा किसी ब्लॉगर को प्राप्त नहीं है। लेकिन व्यवहार में बात बिल्कुल अलग है। जहाँ अख़बारों और समाचार चैनलों के पत्रकारों के लिए राजनेता और नौकरशाहों से अधिकारपूर्वक जानकारी माँगना और उनतक पहुँचना बहुत आसान है, आम जनता और चिट्ठाकारों के लिए ऐसा कर पाना बहुत मुश्किल है। उनके लिए सूचना का अधिकार ही जानकारी हासिल कर सकने का सबसे कारगर अस्त्र है। सूचना के अधिकार के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित करने वाली पूर्व आई.ए.एस. अधिकारी और सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा रॉय ने भी फाइल नोटिंग्स को सूचना के अधिकार के दायरे से बाहर किए जाने संबंधी मंत्रिमंडल के निर्णय की तीव्र आलोचना की है और इसके विरुद्ध आंदोलन करने का आह्वान किया है। दिल्ली में सूचना के अधिकार के लिए सफलतापूर्वक आंदोलन चला रहे परिवर्तन के संयोजक अरविन्द केजरीवाल ने भी सरकार के कदम का विरोध किया है।
चिट्ठाकारी आने वाले दिनों में मुख्यधारा की पत्रकारिता का लोकप्रिय विकल्प बनने वाला है। बहुत से चिट्ठाकार (ब्लॉगर) नागरिक पत्रकार (सिटीजन जर्नलिस्ट) की भूमिका निभा रहे हैं। यहाँ तक कि कई प्रशिक्षित पत्रकार भी ब्लॉगिंग को पूर्णकालिक अथवा अंशकालिक रूप से अपना रहे हैं। उनके पास पी.आई.बी. या सरकार का प्रत्यायन (एक्रीडिशन) भले नहीं हो, लेकिन सूचना के अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संबंधी मौलिक अधिकारों का उपयोग करते हुए वे प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं। वैकल्पिक मीडिया के लिए सूचना के अधिकार में एक साल के भीतर ही इस प्रकार की गंभीर सेंध बहुत नुकसानदायक है और हमें इसका विरोध करने के लिए सभी राजनीतिक दलों के प्रमुख नेताओं तक अपनी बात पहुँचानी चाहिए।
यदि लोगों को अपने काम की सूचना अपने बलबूते पर सूचना के अधिकार के तहत मिलने लगेगी तो प्रेस और मीडिया पर उनकी निर्भरता कम होने लगेगी। अख़बारों और समाचार चैनलों को सूचना के अधिकार की विशेष जरूरत भले नहीं हो, इसलिए हो सकता है कि वे उसकी विशेष परवाह नहीं करें, लेकिन आम जनता और चिट्ठाकारों के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है।
सूचना का अधिकार मिलने के बाद भारत से भ्रटाचार मिटने की गुंजाइश बनी थी| लोगों को इससे बहुत अशायें थी| पर अब सारी अशाओं पर पानी फेरने की तैयारी चल रही है| लाभ के पद का बिल भी भ्रष्टाचार के संरक्षण का नमूना है| प्रगतिशील कानून देश के विकास को बल प्रदान करते हैं| मैं आपके विचार से सहमत हूँ कि देश के शुभ की चिन्ता करने वालों को ऐसे शुभंकर कानून की रक्षा करने के लिये जी-जान से जुट जाना चाहिये|
सृजन शिल्पी जी, आपकी ये प्रविष्टी मुझे अच्छी लगी, इस लिए यहां डाल दी है। अगर आपत्ती हो तो बताईएगा। धन्यवाद।
क्या फाइल नोटिग्स की छायाप्रति प्राप्त की जा सकती है?और क्या यह सूचना के अधिकार के तहत आती है?क्या मुझे भारत सरकार के किसी ऑफिसियल साइट का पता कोई मित्र बता सकते हैं जहां से मैं हिंदी में इस संबंध में जानकारी प्राप्त कर सकूं?
मेरा ई मेल आइ डी है:-mrityuynjay@gmail.com
मृत्युंजय जी, आपके प्रश्नों का विस्तृत उत्तर देते हुए मैंने एक नई प्रविष्टि लिख दी है। सारे संबंधित लिंक्स भी उपलब्ध करा दिए हैं।